चित्तूर में खरीफ़ की आशाएँ धुंधली, मानसून सूखा
मार्च से शुरू हुई लगातार सूखी हवाएँ और अनियमित दक्षिण-पश्चिमी मानसून ने चित्तूर के बरसाती क्षेत्रों को अभूतपूर्व संकट में डाल दिया है। खेतों में जल की कमी के कारण फसल के अंकुरण से लेकर फलन तक सभी चरणों में बाधाएँ उत्पन्न हो रही हैं। कई किसान अब यह सोचने लगे हैं कि इस खरीफ़ में उनकी आय का स्तर पिछले वर्षों की तुलना में बहुत कम रहेगा।
मौसम विज्ञान विभाग ने बताया कि इस वर्ष का मानसून अपेक्षाकृत देर से और कम मात्रा में आया है, जिससे वर्षा‑संचयन तालाबों और जलाशयों में जल स्तर घट गया है। जल उपलब्धता की कमी के कारण किसान सिंचाई के वैकल्पिक साधनों की तलाश में हैं, परन्तु आर्थिक बोझ बढ़ने से यह उपाय कई छोटे किसानों के लिए कठिन हो रहा है। इस स्थिति में सरकार द्वारा प्रदान किए जाने वाले बीज, उर्वरक और जल सहायता के पैकेज की आवश्यकता अधिक स्पष्ट हो गई है।
स्थानीय प्रशासन ने आपातकालीन राहत योजना की रूपरेखा तैयार की है, जिसमें जल टैंकों की त्वरित व्यवस्था, ड्रिप इरिगेशन के लिए सब्सिडी और फसल बीमा का विस्तार शामिल है। साथ ही, किसानों को वैकल्पिक फसलें जैसे जौ और मक्का की ओर मोड़ने की सलाह दी जा रही है, जो कम जल में भी उगाई जा सकती हैं। इन उपायों के बावजूद, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून की स्थिति में सुधार नहीं आया तो इस खरीफ़ की कुल उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट देखी जा सकती है।