पुणे के जनजातीय छात्रों का विरोध १३वें दिन, जनजातीय मंत्री के साथ वार्ता में कोई प्रगति नहीं
पुणे में जनजातीय छात्रों ने अपने विरोध को तेरहवें दिन तक बढ़ा दिया है और उन्होंने कहा कि जनजातीय मंत्री के साथ हुई वार्ता में कोई ठोस समाधान नहीं निकला। छात्रों का प्रमुख दावा है कि १४ अगस्त २०२६ को जारी किया गया सरकारी निर्णय उनके शैक्षणिक अधिकारों को हनन करता है, इसलिए उन्होंने इसे रद्द करने की मांग की है। विभाग के सचिव विजय वाघमारे ने बताया कि इस माँग पर विभाग ने अस्थायी रोक का आदेश जारी किया है, जिससे छात्रों में असंतोष की लहर तेज़ हो गई है।
पुणे में हाल ही में हुई कई घटनाएँ इस विरोध के पृष्ठभूमि को और जटिल बना रही हैं। पिछले साल शहर में एक युवा रियल एस्टेट व्यापारी की हत्या का मामला उजागर हुआ, जिसमें सामाजिक तनाव की लहर दौड़ गई थी। उसी वर्ष एक ६५ वर्षीय व्यक्ति को नाबालिग के बलात्कार‑हत्या के लिए मृत्युदंड सुनाया गया, जिससे न्याय प्रणाली पर गहरी चर्चा हुई। इसके अलावा, पुणे में आयोजित अंतरराष्ट्रीय शतरंज प्रतियोगिता ने शहर को सकारात्मक प्रकाश में लाया, परन्तु सामाजिक असंतोष को कम नहीं कर पाया।
विद्यार्थियों ने कहा कि यदि सरकार उनके माँगों को नहीं मानती तो वे और अधिक सख्त कदम उठाने को तैयार हैं। उन्होंने पुनः वार्ता की मांग की है और साथ ही शैक्षणिक संस्थानों में अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानूनी सहायता भी चाही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के लंबे समय तक चलने वाले विरोध को सुलझाने के लिए संवाद को पुनः सक्रिय करना आवश्यक है, अन्यथा सामाजिक अस्थिरता बढ़ सकती है।