उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने अनुसंधान‑उन्मुख शिक्षा की वकालत की
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच पर छात्रों को केवल डिग्री प्राप्त करने के बजाय अनुसंधान और नवाचार क्षमताओं को विकसित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य समाज को लाभ पहुंचाना होना चाहिए, न कि केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का संग्रह। इस विचार को उन्होंने लद्दाख में योग के वास्तविक स्वरूप को दर्शाने वाले अपने पिछले बयान से जोड़ते हुए बताया कि जैसे योग ने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ किया, वैसे ही अनुसंधान‑उन्मुख शिक्षा से राष्ट्रीय प्रगति को गति मिलेगी।
उपराष्ट्रपति ने यह भी स्पष्ट किया कि उच्च शिक्षा संस्थानों को अपने शैक्षणिक कार्यक्रमों का मूल्यांकन सामाजिक प्रभाव के आधार पर करना चाहिए। उन्होंने कहा कि शोध के परिणामों को वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान में परिवर्तित करना चाहिए, जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में विकास हो सके। इस दिशा में नीतियों में बदलाव और वित्तीय समर्थन आवश्यक है, ताकि युवा वैज्ञानिकों को प्रयोगशालाओं और नवाचार केंद्रों तक पहुंच मिल सके।
राधाकृष्णन ने अपने भाषण में पिछले कुछ हफ्तों की घटनाओं का भी उल्लेख किया, जैसे कि कोलकाता में इस्कॉन के उपाध्यक्ष के हटाए जाने से उत्पन्न सामाजिक विमर्श, जो दर्शाता है कि सार्वजनिक व्यक्तियों के शब्दों का गहरा प्रभाव होता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में भी इसी प्रकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही आवश्यक है, ताकि छात्रों को सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना के साथ अनुसंधान करने की प्रेरणा मिले। इस प्रकार उनका संदेश न केवल शैक्षणिक सुधार की ओर इशारा करता है, बल्कि एक समग्र, सामाजिक‑उन्मुख विकास की दिशा में भी प्रेरित करता है।