तमिलनाडु की मातृत्व अवकाश नीति दक्षिण भारत की प्रजनन दरों पर प्रकाश डालती है | Kashyap Sandesh
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तमिलनाडु की मातृत्व अवकाश नीति दक्षिण भारत की प्रजनन दरों पर प्रकाश डालती है

R c Nishad(साहनी) · 19 अगस्त 2026

तमिलनाडु ने हाल ही में मातृत्व अवकाश को दो महीने से बढ़ाकर छह महीने करने का प्रस्ताव रखा है, जिससे कार्यरत महिलाओं को गर्भावस्था और प्रसव के बाद पर्याप्त समय मिल सके। यह कदम दक्षिणी राज्यों में सबसे कम प्रजनन दरों को सुधारने की दिशा में उठाया गया है, जहाँ जनसंख्या वृद्धि धीमी हो रही है और वृद्ध जनसंख्या का अनुपात लगातार बढ़ रहा है। सरकार का मानना है कि आर्थिक सुरक्षा और स्वास्थ्य देखभाल में सुधार से परिवार नियोजन के निर्णयों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

पिछले महीने प्रकाशित एमोस रिपोर्ट ने मातृत्व सुरक्षा आयोग की स्थापना की सिफ़ारिश की थी, लेकिन कई विशेषज्ञों ने कहा कि वह रिपोर्ट प्रणालीगत नस्लीय भेदभाव और दर्दनाक प्रसव जैसी गहरी समस्याओं को पर्याप्त रूप से नहीं छू पाई। एमिली बार्ले, मातृत्व सुरक्षा गठबंधन की संस्थापक, ने इस नई नीति को लेकर चेतावनी दी थी कि केवल अवकाश बढ़ाने से व्यापक सांस्कृतिक बदलाव नहीं आएगा। तमिलनाडु की इस पहल को देखते हुए, यह देखना होगा कि क्या यह कदम उन गहरी सामाजिक बाधाओं को भी दूर कर पाएगा।

तमिलनाडु के अलावा, राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस के अवसर पर जी.के. वासन ने डॉक्टरों की मांगों को सरकार के सामने रखा था, जिसमें मातृत्व देखभाल के मानकों को ऊँचा करने की भी बात शामिल थी। इस संदर्भ में, मातृत्व अवकाश में वृद्धि न केवल महिलाओं के स्वास्थ्य को सुदृढ़ करेगी, बल्कि स्वास्थ्य कर्मियों के कार्यभार को भी संतुलित करेगी। यदि यह नीति सफल रहती है, तो यह दक्षिण भारत के अन्य राज्यों के लिए एक मॉडल बन सकती है और भविष्य में जनसंख्या संरचना में संतुलन लाने में मददगार सिद्ध हो सकती है।

स्रोत: NDTV India

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