इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त फटकार: पंचायत चुनाव टालने पर सरकार के रवैये से अदालत नाराज
प्रयागराज: उत्तर प्रदेश सरकार के टालमटोल वाले रवैये और प्रशासनिक ढुलमुल नीति पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। सूबे में ग्रामीण निकाय (पंचायात) चुनावों को जानबूझकर लटकाने और नियमों को ताक पर रखकर ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त करने के सरकारी फैसले पर कोर्ट ने तीव्र नाराजगी जताई है। जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने दो टूक शब्दों में सरकार से पूछा कि आखिर डिवीजन बेंच के पिछले आदेशों का उल्लंघन करते हुए यह मनमाना कदम कैसे उठाया गया? कोर्ट ने इसे 'अवमानना' की श्रेणी में माना है।
सुनवाई के दौरान राज्य चुनाव आयोग ने साफ किया कि वह चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार है और 10 जून को ही मतदाता सूची भी प्रकाशित कर दी गई थी, लेकिन राज्य सरकार की तरफ से जरूरी प्रशासनिक और सुरक्षा इंतजाम न मिलने के कारण पूरी प्रक्रिया रुकी हुई है। कोर्ट ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि 13 जुलाई तक इस पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो संबंधित शीर्ष अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होना पड़ेगा। यह स्थिति दर्शाती है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को समय पर पूरा करने में सरकार किस कदर पीछे छूट रही है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की इस सख्ती से यह स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक प्रक्रियाओं की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। सरकार को चाहिए कि वह अपने रवैये में सुधार लाए और पंचायत चुनावों को समय पर संपन्न कराने के लिए आवश्यक कदम उठाए। यह न केवल लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, बल्कि यह जनता के विश्वास को भी बनाए रखने में मदद करेगा।
इस मामले में आगे की सुनवाई 13 जुलाई को होगी, जब सरकार को अपना जवाब देना होगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस मामले में क्या जवाब देती है और क्या वह पंचायत चुनावों को समय पर कराने के लिए आवश्यक कदम उठाने को तैयार है।