डूमडूमा में एजेपी के सचिव जगदीश भुयन ने राज्य सरकार द्वारा वन बोर्ड को पुनर्गठित करने के निर्णय पर सवाल उठाए, विशेषकर डेबोलाल गोरलसा और तुलीराम रॉन्घांग को संरक्षणकर्ता के रूप में नियुक्त करने को लेकर। उन्होंने कहा कि इन व्यक्तियों का मुख्य कार्य प्रशासनिक है, न कि वन्यजीव संरक्षण में विशेषज्ञता। इस प्रकार के चयन से बोर्ड की कार्यक्षमता और पर्यावरणीय नीतियों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं।
पिछले कुछ महीनों में असम में विभिन्न क्षेत्रों में पारदर्शिता की मांगें बढ़ी हैं। असम महिला विश्वविद्यालय में विभिन्न प्रशासनिक पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया में भी कई सवाल उठे थे, जहाँ योग्य उम्मीदवारों को उचित अवसर नहीं मिलने की शिकायतें सामने आई थीं। इसी तरह, मेहली मिस्त्री ने महाराष्ट्र में टाटा ट्रस्ट्स के शासन‑प्रणाली और हितों के टकराव पर गंभीर प्रश्न उठाए थे, जिससे सार्वजनिक संस्थानों में जवाबदेही की आवश्यकता स्पष्ट हुई। ओडिशा में नाबा दास हत्या मामले में भी सीबीआई जांच की मांग की गई थी, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता की मांग को बल मिला।
इन सभी घटनाओं के प्रकाश में असम सरकार से अपेक्षा की जा रही है कि वह वन बोर्ड के पुनर्गठन में विशेषज्ञता और पारदर्शिता को प्राथमिकता दे। पर्यावरणीय कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज ने बोर्ड के सदस्य चयन में स्वतंत्र विशेषज्ञों की भागीदारी की मांग की है, ताकि वन्यजीव संरक्षण के लक्ष्य प्रभावी रूप से प्राप्त हो सकें। यदि सरकार इन मांगों को नजरअंदाज करती है, तो भविष्य में नीति‑निर्धारण में सार्वजनिक विश्वास घट सकता है और पर्यावरणीय संरक्षण के प्रयासों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

