आइसलैंड में यूरोपीय संघ के साथ पुनः वार्ता को लेकर आयोजित जनमत सर्वेक्षण ने देश को दो भागों में बाँट दिया। वित्तीय रूप से समर्थित 'नहीं' अभियान ने डरावनी बातें फैलाकर मतदाताओं को प्रभावित किया, जबकि प्रश्न की शब्दावली ने भी परिणाम पर असर डाला। लगभग पाँच लाख जनसंख्या में केवल कुछ हजार मतों का अंतर ही विजेता तय कर गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि छोटे‑छोटे मतभेद भी राष्ट्रीय दिशा को बदल सकते हैं।
पिछले कुछ महीनों में विश्व भर में कई प्रमुख घटनाओं ने समान विभाजन दिखाए हैं। उदाहरण के तौर पर, ब्रेक्सिट ने स्कॉटलैंड की राजनीतिक धारा को बदल दिया, जबकि फुटबॉल विश्व कप में पुर्तगाल की धीमी शुरुआत के बावजूद उसकी संभावनाओं पर बहस छिड़ी। इसी तरह, विंबलडन में जैनिक सिन्नर को शुरुआती कठिनाई के बावजूद खिताब बचाने की उम्मीद ने दर्शकों को आश्चर्यचकित किया। इन घटनाओं ने दिखाया कि सार्वजनिक राय अक्सर अप्रत्याशित कारकों से प्रभावित होती है।
आइसलैंड के इस सर्वेक्षण में भी प्रश्न की शब्दावली ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 'यूरोपीय संघ के साथ पुनः वार्ता' के बजाय 'संबंध पुनः स्थापित करना' जैसे शब्दों ने मतदाताओं के मन में संकोच उत्पन्न किया। साथ ही, 'नहीं' अभियान की वित्तीय शक्ति ने व्यापक प्रचार किया, जिससे कई लोग डर के कारण 'नहीं' को ही चुनते रहे। इस प्रकार, वित्तीय समर्थन, प्रश्न की अभिव्यक्ति और राष्ट्रीय भावना ने मिलकर इस नतीजे को आकार दिया। भविष्य में यदि सरकार इस विभाजन को पाटना चाहती है तो संवाद को स्पष्ट और संतुलित रखना आवश्यक होगा।

