आंध्र प्रदेश के बपतला जिले में सूखे की मार से जमीन बंजर हो गई है, जहाँ किसान पारंपरिक जलस्रोतों पर निर्भर थे। अब उन्हें एल नीनो के कारण घटते वर्षा के साथ-साथ जलभरण की कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे फसल उत्पादन में भारी गिरावट आई है। इस कठिनाई के बीच, राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने एरुवाका पौर्नमी पर किसानों को आश्वासन दिया कि सरकार जल आपूर्ति और बीज समर्थन में मदद करेगी, परंतु वास्तविक सहायता की गति अभी तक स्पष्ट नहीं हुई है।
कृष्णा डेल्टा में किसान डिज़ल‑पम्पों पर निर्भर हैं, जो महँगी ईंधन लागत के कारण वित्तीय बोझ बढ़ा रहे हैं। पवन और सौर ऊर्जा के विकल्पों की चर्चा हुई है, परंतु निवेश की कमी और तकनीकी समर्थन की अनुपलब्धता ने इस परिवर्तन को धीमा कर दिया है। इसी बीच, पश्चिमी गोदावरी में धान के खेत सड़ने लगे हैं, जिससे किसानों को न केवल फसल का नुकसान बल्कि बाजार में कीमतों में गिरावट का भी सामना करना पड़ रहा है। पिछले सप्ताह की रिपोर्ट में बताया गया था कि यूके की खाद्य सुरक्षा योजना को लेकर किसानों ने वित्तीय समर्थन की कमी की आलोचना की थी, जो आंध्र प्रदेश के किसानों की समान चिंताओं को दर्शाता है।
वित्तीय जोखिम को कम करने के लिए कई किसान ऋण पुनर्गठन और बीमा योजनाओं की मांग कर रहे हैं। हालांकि, राज्य में भ्रष्टाचार के मामलों, जैसे ओडिशा के नबरंगपुर में पशु निरीक्षक पर मिली रिश्वत, ने सार्वजनिक भरोसे को कमज़ोर किया है, जिससे सरकारी योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु अनुकूलन के लिए दीर्घकालिक नीतियों, सस्ती ऊर्जा समाधान और पारदर्शी वित्तीय सहायता आवश्यक है, ताकि आंध्र प्रदेश के किसान इस दोहरी संकट से बाहर निकल सकें।
