दिल्ली उच्च न्यायालय की एक बेंच, जिसमें न्यायाधीश प्रथिबा एम. सिंह और न्यायाधीश विकास महाजन शामिल थे, ने कहा कि अस्थायी विक्रय प्रमाणपत्र (CoV) के तहत स्थायी विक्रय स्थल की मांग को स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि ये प्रमाणपत्र विशिष्ट शर्तों और नियमों के अधीन होते हैं, जो केवल अस्थायी विक्रय स्थानों को ही मान्य बनाते हैं। इस कारण, विक्रेताओं को स्थायी स्थल मिलने की आशा को कानूनी रूप से खारिज किया गया।

यह निर्णय पिछले कुछ हफ्तों में विभिन्न राज्यों में हुए विक्रेता पुनर्वास के मामलों से जुड़ता है। शोपियन में विक्रेताओं को नई विक्रय ज़ोन में स्थानांतरित करने पर विरोध हुआ, जबकि ओडिशा के कटक में निर्मित कई लाख रुपये की लागत वाले विक्रय ज़ोन अभी तक उपयोग में नहीं आए हैं। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया है कि अस्थायी प्रमाणपत्रों के साथ स्थायी समाधान प्रदान करना प्रशासनिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चुनौतीपूर्ण है।

न्यायालय के इस आदेश के बाद, दिल्ली के कई सड़क विक्रेता अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता में हैं। वे अब यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या इस निर्णय को चुनौती दी जा सकती है या फिर सरकार को अस्थायी प्रमाणपत्रों की शर्तों में बदलाव करना पड़ेगा। इस बीच, बीहड़ संपत्तियों पर आर्थिक अपराध जांच एजेंसी द्वारा की गई कार्रवाई ने भी यह संकेत दिया है कि सरकारी नीतियों और उनके कार्यान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता बढ़ रही है।