1847 में सैंडबैक, टिन्ने एंड कंपनी के लिवरपूल कार्यालय को लिखे गए एक पत्र में यह स्पष्ट रूप से लिखा गया कि दासता समाप्ति के बाद भी कंपनी ने अफ्रीकी दासों को अवैध रूप से गुयाना में तस्करी करना जारी रखा। यह पत्र दर्शाता है कि कंपनी ने करदाता‑भुगतान वाले मुआवजे के बाद भी अपने व्यापारिक लाभ के लिये मानवीय अधिकारों की अनदेखी की। इस प्रकार की तस्करी ने उन लोगों को और अधिक पीड़ा दी, जो पहले ही दासता के अत्याचारों से जूझ रहे थे।
यह नई खोज पिछले कुछ महीनों में उजागर हुई कई अन्य मानव तस्करी मामलों के साथ जुड़ती है। तमिलनाडु गैस दुर्घटना में उज्जर जनजातीय लड़कियों की तस्करी का खुलासा हुआ था, जबकि संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख ने साइबर‑ड्रग तस्करी को रोकने के लिये तकनीक के उपयोग की अपील की थी। इसी प्रकार, दिल्ली पुलिस ने हाल ही में एक ड्रग तस्करी जाल को ध्वस्त किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मानव तस्करी के विभिन्न रूप आज भी समाज में गहराई से जड़ें जमा चुके हैं।
इतिहासकारों का मानना है कि इस प्रकार के दस्तावेज़ न केवल अतीत की कड़वी सच्चाइयों को उजागर करते हैं, बल्कि वर्तमान में मानव तस्करी के खिलाफ सख्त नीतियों की आवश्यकता को भी रेखांकित करते हैं। दासता समाप्ति के बाद भी जारी रही यह तस्करी, ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था की दोहरी मानदंडता को दर्शाती है, जहाँ बड़े प्लांटेशन मालिकों को भारी मुआवजा मिला, जबकि पीड़ितों को कोई न्याय नहीं मिला। इस घटना ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को फिर से मानवाधिकारों की रक्षा के लिये सख्त कदम उठाने की पुकार की है।

