जैसे ही राजस्थान और हरियाणा ने ३२ वर्षों के बाद यमुना जल परियोजना के लिए ३४,१०२ करोड़ रुपये की समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए, राज्य के कई क्षेत्रों में जल उपलब्धता की आशा जगी। इस समझौते के तहत यमुना नदी से जल को दो राज्यों में बाँटने की योजना थी, जिससे जल संकट से जूझ रहे क्षेत्रों को राहत मिल सके। हालांकि, इस बड़े निवेश के बावजूद, कई ब्लॉकों में जल की गुणवत्ता में गिरावट स्पष्ट रूप से सामने आई है, जो इस परियोजना की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

हरियाणा के कांग्रेस विधायक ने बताया कि २०२२ के बाद से ९३ ब्लॉकों में जल की शुद्धता में गिरावट दर्ज की गई है। पालवाल में कुल घुलित ठोस (TDS) का स्तर ७४ प्रतिशत बढ़कर १,६३६ मिलीग्राम प्रति लीटर हो गया, जबकि नुह के इंद्रि ब्लॉक में यह स्तर १,९७४ मिलीग्राम तक पहुँच गया, जो दो गुना से अधिक है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि न केवल जल की मात्रा बल्कि उसकी गुणवत्ता भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है, जिससे पीने वाले और कृषि उपयोग दोनों में जोखिम बढ़ रहा है।

विधायक ने कहा कि जल गुणवत्ता में इस गिरावट को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने आवश्यक हैं। उन्हें यमुना जल परियोजना के कार्यान्वयन में पारदर्शिता और निगरानी को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही, जल परीक्षण केंद्रों की संख्या बढ़ाकर नियमित परीक्षण कराना, तथा जल शोधन सुविधाओं का विस्तार करना अनिवार्य है। यदि इन उपायों को समय पर लागू नहीं किया गया तो स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ और कृषि उत्पादन में गिरावट जैसी गंभीर स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।