जून के अंतिम दिनों में लेबनान और इज़राइल ने एक व्यापक ढांचा समझौता किया, जिसमें हेज़्बोल्लाह का निरस्त्रीकरण, इज़राइल की सेना का दक्षिण लेबनान से क्रमिक वापसी और लेबनानी सेना की “पायलट ज़ोन” में तैनाती का प्रावधान था। इस समझौते को दोनों पक्षों ने प्रारम्भिक आशा के साथ स्वीकार किया, परन्तु हेज़्बोल्लाह के प्रमुख ने इस पर फिर से अपना विरोध व्यक्त किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोई भी “समर्पण” स्वीकार्य नहीं है और इस समझौते को “अवैध” घोषित किया।

इसी बीच इज़राइल के प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कई बार दोहराया कि इज़राइल दक्षिण लेबनान में तब तक रहेगा जब तक हेज़्बोल्लाह निरस्त्री नहीं हो जाता। उन्होंने 27 जून को कहा था कि सुरक्षा क्षेत्र में इज़राइल की उपस्थिति एक बड़ी उपलब्धि है और 30 जून को उन्होंने अपने सैनिकों से कहा कि वे “धमकी” के कारण इस क्षेत्र को नहीं छोड़ेंगे। नेतन्याहू ने हाल ही में दक्षिण लेबनान में अपने सैनिकों का दौरा भी किया, जिससे इज़राइल की दृढ़ स्थिति स्पष्ट हुई।

हेज़्बोल्लाह की इस पुनः अस्वीकृति से क्षेत्र में तनाव फिर से बढ़ सकता है। यदि दोनों पक्ष इस समझौते को लागू नहीं कर पाते, तो दक्षिण लेबनान में इज़राइल की निरंतर उपस्थिति और हेज़्बोल्लाह की सशस्त्र स्थिति दोनों ही सुरक्षा जोखिम को बढ़ा सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को अब इस स्थिति को संभालने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज़ करने की आवश्यकता है, ताकि एक स्थायी शांति व्यवस्था स्थापित की जा सके।