क्वींसलैंड राज्य सरकार ने हाल ही में एक नया आपराधिक न्याय विधेयक पारित किया, जिसमें दस वर्ष की आयु से ही बच्चों को एक वर्ष की अनिवार्य जेल सजा दी जा सकती है। यह विधेयक ‘जमानत तोड़ो, जेल जाओ’ के नाम से जाना जाता है और इसका उद्देश्य अपराधियों को सख्त दंड देना बताया गया है। परन्तु मानवाधिकार वकीलों ने इस कदम को अत्यंत कठोर और बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन के रूप में आलोचना की है, क्योंकि इससे नाबालिगों को पुनर्वास के बजाय कठोर कारावास का सामना करना पड़ेगा।

सरकार ने स्वीकार किया कि यह कानून मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है और राज्य के पहले से ही भीड़भाड़ वाले जेलों, युवा हिरासत केंद्रों और पुलिस वॉचहाउसों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकता है। इस संदर्भ में, ओडिशा में रेडहाखोल उपजेल में मुख्य वार्डर और कैदी के बीच गठबंधन की जांच और पंजाब में फरार जीवन दण्डी की गिरफ्तारी जैसी घटनाएँ न्यायिक प्रणाली में मौजूदा खामियों को उजागर करती हैं। इन पूर्व घटनाओं ने यह स्पष्ट किया है कि कठोर दंड नीतियों से न केवल जेलों में भीड़ बढ़ती है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और मानवीय दृष्टिकोण की कमी भी स्पष्ट होती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की सख्त सजा न केवल बच्चों के भविष्य को नष्ट करेगी, बल्कि सामाजिक पुनर्संयोजन में भी बाधा उत्पन्न करेगी। वे सुझाव देते हैं कि बच्चों के अपराधों के लिए पुनर्वास, शिक्षा और सामाजिक समर्थन पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए, न कि उन्हें कठोर कारावास में डालना। इस दिशा में, सरकार को अपने कानूनों को पुनः विचार करना चाहिए और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप नीतियों को अपनाना चाहिए।