अक्टूबर २०२१ में इथियोपिया के बहर दार में एक प्रोफेसर की हत्या के बाद, मेटा के एल्गोरिद्म ने उस हत्या को बढ़ावा देने वाले पोस्ट को सक्रिय रूप से प्रसारित किया, जैसा कि केन्याई मुकदमे में उजागर हुआ। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेटा की जिम्मेदारी पर सवाल उठाए और अमेरिकी अदालत में एक व्यापक समझौते की राह बनाई, जिसमें उपयोगकर्ता डेटा के दुरुपयोग को रोकने के लिए कड़े नियम शामिल हैं। इस समझौते के बाद कई देशों ने समान प्रतिबंधों की मांग की है, जिससे मेटा को वैश्विक स्तर पर अपने संचालन में बदलाव करने पड़ेगा।

भारत में मेटा के प्लेटफ़ॉर्म पर छोटे व मध्यम उद्यमों का अनुपात ९२ प्रतिशत से अधिक है, जिससे डिजिटल अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी कारण केंद्र ने व्हाट्सएप के प्रस्तावित उपयोगकर्ता नाम फीचर को रोकने का निर्देश जारी किया, क्योंकि इस सुविधा से पहचान चोरी और धोखाधड़ी के जोखिम बढ़ सकते हैं। सरकार का यह कदम मेटा के प्रति बढ़ती नियामक सतर्कता को दर्शाता है, जो अमेरिकी समझौते के बाद भारत में भी कड़ी निगरानी की संभावना को उजागर करता है।

केन्या, नीदरलैंड और इथियोपिया जैसे देशों में चल रहे अलग‑अलग कानूनी कार्यवाही यह संकेत देती है कि मेटा को अब अपने कंटेंट मॉडरेशन, विज्ञापन पारदर्शिता और उपयोगकर्ता सुरक्षा नीतियों में सुधार करना अनिवार्य हो गया है। इन मामलों में न्यायालय ने कंपनी को नुकसान की भरपाई और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के उपाय अपनाने का आदेश दिया है। इस प्रकार, अमेरिकी समझौता न केवल एक राष्ट्रीय मामला रहा, बल्कि वैश्विक स्तर पर डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की जवाबदेही को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गया है।