पश्चिम बंगाल के एक छोटे शहर में रहने वाले रफ़ीकुल बिस्वास को हाल ही में फिर से अवैध प्रवासी अभियान के तहत गिरफ्तार किया गया। यह वही अभियान है जिसमें कई मुसलमानों को उनके धर्म या मूल के आधार पर लक्षित किया जा रहा है। रफ़ीकुल ने बताया कि जब भी कोई उनका मूल पूछता है तो तुरंत “बांग्लादेश जाओ” जैसी कठोर प्रतिक्रिया मिलती है, जिससे उनका भारतीय पहचान सिद्ध करना कठिन हो जाता है। इस प्रकार की सामाजिक दबाव को देखते हुए कई नागरिक न्यायालय की ओर रुख कर रहे हैं।

पिछले सप्ताह बंबई के गोवा हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि आपराधिक कानून को किसी भी प्रकार के दबाव या उत्पीड़न के साधन के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता। इस निर्णय ने रफ़ीकुल जैसे कई लोगों को आशा दी है कि उनके खिलाफ किए जा रहे अनुचित कार्यों को न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से रोका जा सकता है। हालांकि, वास्तविकता में पुलिस की कार्रवाई अक्सर कानूनी सीमाओं को पार कर जाती है, जिससे नागरिकों में भय और असुरक्षा की भावना बढ़ती है। इस संदर्भ में सामाजिक संगठनों ने भी इस मुद्दे पर प्रकाश डालते हुए सरकार से त्वरित कार्रवाई का अनुरोध किया है।

रफ़ीकुल बिस्वास ने अपने अनुभव को शब्दों में बयां करते हुए कहा, “हर बार जब कोई पूछता है कि हम कहाँ से हैं, हमारा डर शब्दों में नहीं बयां किया जा सकता। यदि आप पश्चिम बंगाल के मुस्लिम हैं तो तुरंत बांग्लादेश भेज दिया जाता है। हमें यह साबित करने के लिए क्या करना पड़ेगा कि हम भारतीय हैं?” उन्होंने न्याय की मांग की और सभी को इस प्रकार के भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठाने का आह्वान किया। इस प्रकार की घटनाएँ न केवल व्यक्तिगत अधिकारों को प्रभावित करती हैं, बल्कि सामाजिक एकता और राष्ट्रीय अखंडता को भी चुनौती देती हैं।