पिछले कुछ हफ्तों में रुपया लगातार अस्थिरता का सामना कर रहा था। २ जुलाई को रुपया ६० पैसे गिरकर ९५.१६ पर बंद हुआ, जबकि ३० जून को ५ पैसे की गिरावट के साथ ९४.५६ पर समाप्त हुआ। इन उतार-चढ़ावों का मुख्य कारण वैश्विक जोखिम‑ऑफ़ माहौल और अमेरिकी डॉलर की मजबूती था। इस बीच, तेल की कीमतों में गिरावट ने कुछ राहत प्रदान की, परन्तु समग्र दबाव बना रहा।
आज के सत्र में, विदेशी मुद्रा व्यापारियों ने बताया कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने संभावित रूप से बाजार में हस्तक्षेप किया होगा, जिससे रुपया को समर्थन मिला। इस हस्तक्षेप की संभावना तब उभरी जब बाजार में यह अनुमान बढ़ा कि अमेरिकी फेडरल रिज़र्व सितंबर में ब्याज दर बढ़ा सकता है। ऐसी अपेक्षा ने डॉलर को और मजबूत किया, परन्तु भारतीय रिज़र्व बैंक की कार्रवाई ने रुपया को स्थिर किया और २६ पैसे की बढ़ोतरी के साथ ९५.१७ पर बंद किया।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिकी फेडरल रिज़र्व की दर वृद्धि की संभावना बनी रहती है, तो डॉलर की ताकत जारी रह सकती है, जिससे भारतीय मुद्रा पर दबाव फिर से बढ़ सकता है। वहीं, यदि भारतीय रिज़र्व बैंक निरंतर बाजार में समर्थन प्रदान करता रहेगा, तो रुपया को कुछ हद तक स्थिरता मिल सकती है। भविष्य में तेल की कीमतों, वैश्विक जोखिम भावना और मौद्रिक नीति के विकास को नज़र में रखकर ही मुद्रा की दिशा का सही अनुमान लगाया जा सकेगा।

