भारत में सौर ऊर्जा के साथ कृषि को जोड़ने वाले अग्रिवोल्टाइक मॉडल ने किसानों के लिए नई संभावनाएँ खोल दी हैं। इस मॉडल में सौर पैनलों के नीचे फसलें उगाकर बिजली उत्पादन और कृषि आय दोनों को एक साथ बढ़ाया जा सकता है। एनटीपीसी द्वारा रामगुंडम जलाशय में स्थापित १७६ मेगावॉट का तैरता सौर प्रोजेक्ट इस दिशा में एक प्रमुख उदाहरण है, जहाँ जल सतह पर सौर पैनल स्थापित कर बिजली उत्पादन के साथ जल संरक्षण भी संभव हुआ है।

भुवनेश्वर नगर निगम द्वारा प्रमुख सार्वजनिक मार्गों पर सौर-स्मार्ट बेंचों की स्थापना भी हरित ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देती है और नागरिकों को सौर ऊर्जा के लाभों से परिचित कराती है। इन पहलों ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सौर ऊर्जा के प्रति जागरूकता बढ़ाई है, जिससे अग्रिवोल्टाइक मॉडल को अपनाने की इच्छा में वृद्धि हुई है। परन्तु, इस मॉडल को व्यापक रूप से लागू करने में कई बाधाएँ सामने आती हैं।

सबसे बड़ी बाधा प्रारम्भिक निवेश की उच्च लागत है, जिससे छोटे और मध्यम आकार के किसानों के लिए वित्तीय भार बढ़ जाता है। साथ ही, वित्तीय संस्थानों से पर्याप्त ऋण सुविधा न मिलने और नीति समर्थन में असमानता भी इस मॉडल के विस्तार को रोकती है। शिक्षा मंत्रालय की स्कूल भर्ती में हस्तक्षेप की मांग जैसी सामाजिक मुद्दों से जुड़ी नीति चुनौतियों को देखते हुए, कृषि नीति में स्पष्ट दिशा-निर्देश और सब्सिडी योजनाओं की आवश्यकता स्पष्ट है। इन चुनौतियों को दूर करने के लिए सरकार को विशेष वित्तीय प्रोत्साहन, आसान ऋण शर्तें और स्पष्ट नियामक ढांचा प्रदान करना चाहिए, जिससे अधिक किसान इस लाभदायक मॉडल को अपनाकर सतत विकास की ओर अग्रसर हो सकें।