पालयनिस्वामी ने हाल ही में विधानसभा में कहा कि टीवीके‑नेतृत्व वाली सरकार ने केवल सौ दिनों में २८,००० करोड़ रुपये का अतिरिक्त ऋण जमा किया है, जो कि एक अत्यधिक चिंताजनक आंकड़ा है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार के मंत्रियों को न तो कार्यप्रणाली की समझ है और न ही विपक्ष द्वारा उठाए गए प्रश्नों के उत्तर देने की क्षमता। इस प्रकार के आरोपों से राज्य की वित्तीय प्रबंधन क्षमता पर सवाल उठते हैं।
पिछले कुछ हफ्तों में भारत के बाहरी ऋण में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, जहाँ मार्च २०२६ के अंत में बाहरी ऋण ७६२.८ अरब डॉलर तक पहुँच गया, जो पिछले वर्ष से २६.३ अरब डॉलर अधिक है। इसी समय, तेलंगाना राज्य ने भी पिछले सरकार से ८.११ लाख करोड़ रुपये का ऋण विरासत में प्राप्त किया, जिसे नई सरकार ने संभालने की चुनौती का सामना किया। इन बड़े‑बड़े ऋणों के बीच, घरेलू ऋण भी जीडीपी के ४५.५ प्रतिशत तक पहुँच गया है, जिससे वित्तीय दबाव और बढ़ गया है।
इन पृष्ठभूमियों को देखते हुए पालयनिस्वामी के आरोपों को गंभीरता से लेना आवश्यक है। यदि सरकार के मंत्रियों को वित्तीय नीतियों की स्पष्ट समझ नहीं है, तो भविष्य में ऋण प्रबंधन में और अधिक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार से पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की माँग की है, ताकि जनता को ऋण के वास्तविक प्रभावों से अवगत कराया जा सके।
