दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में बेघर लोगों को मतदाता सूची से बाहर रखने के आरोप पर दायर याचिका को अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि मौजूदा पंजीकरण तंत्र में कोई खाली जगह नहीं है और याचिकाकर्ता ने केवल "निराधार" दावे प्रस्तुत किए हैं। इस संदर्भ में अदालत ने यह स्पष्ट किया कि दिल्ली में वर्षों से चल रहे ध्वंस अभियानों से विस्थापित व्यक्तियों को मतदाता सूची में शामिल करने की प्रक्रिया पहले से ही स्थापित है।

पिछले कुछ महीनों में विभिन्न न्यायिक मामलों ने अदालतों की सक्रिय भूमिका को उजागर किया है। उदाहरण के तौर पर, दिल्ली उच्च न्यायालय ने अभिनेता सलमान खान के फिल्म "काला हिरण" की सेंसर बोर्ड को भेजे जाने की याचिका पर सुनवाई की थी, जबकि ओडिशा में मेडिकल छात्र की मृत्यु के मामले में विशेष सतर्कता अदालत ने प्रमुख आरोपी को जमानत नहीं दी। इसी प्रकार, त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने पुलिस अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट के गिरफ्तारी दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने पर दंडित किया। इन सभी मामलों ने न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता को दर्शाया है।

इस निर्णय के बाद सामाजिक संगठनों ने कहा कि यह कदम बेघर वर्ग के अधिकारों की सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। वे यह भी आशा व्यक्त कर रहे हैं कि भविष्य में मतदाता सूची में सभी वर्गों का समावेश सुनिश्चित करने के लिए अधिक सक्रिय कदम उठाए जाएंगे। साथ ही, न्यायालय ने सभी संबंधित सरकारी विभागों से अनुरोध किया कि वे विस्थापित लोगों के पंजीकरण को सुगम बनाने के लिए आवश्यक उपाय तुरंत लागू करें।