पंजाब सरकार द्वारा हाल ही में पारित अपवित्रता कानून ने धार्मिक अभिव्यक्तियों की सीमा को नई रूपरेखा दी है। इस कानून में अपवित्रता की परिभाषा को विस्तारित कर शब्द, संकेत और चित्रण को भी दण्डनीय बनाया गया है, जिससे धार्मिक ग्रन्थ के प्रति किसी भी प्रकार की आलोचना या व्याख्या पर प्रतिबंध लग सकता है। इस कदम ने न केवल सिख समुदाय, बल्कि विभिन्न धार्मिक समूहों में भी असंतोष उत्पन्न किया है, क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने का जोखिम रखता है।
अकाल तख्त ने इस विधि को बिना परामर्श के पारित करने के कारण सरकार को एक महीने के भीतर संशोधन करने का आदेश दिया। उन्होंने कहा कि इस कानून में मौजूद कुछ धारा सिख धर्म के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध हैं और समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाती हैं। इस संदर्भ में पिछले दिनों की खबरों में बताया गया था कि अकाल तख्त ने सरकार से अपवित्रता कानून के आपत्तिजनक प्रावधानों को हटाने की मांग की थी, जिससे इस मुद्दे की पृष्ठभूमि स्पष्ट होती है।
धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के सिद्धांत के तहत राज्य को सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार करना चाहिए, परन्तु जब कानून धार्मिक अभिव्यक्तियों को दण्डनीय बनाता है तो यह सिद्धांत चुनौतीपूर्ण हो जाता है। न्यायालयों को यह तय करना होगा कि क्या इस प्रकार की विधि सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा के लिये आवश्यक है या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है। इस बहस में यह भी देखना आवश्यक है कि क्या ऐसी विधियां सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देती हैं या धार्मिक विभाजन को गहरा करती हैं।

