कांग्रेस ने हाल ही में शर्करा की कीमतों में तीव्र वृद्धि को इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति से जोड़ते हुए सरकार पर सवाल उठाए हैं। पिछले तीन महीनों में शर्करा की कीमतें ४८ रुपये से बढ़कर ६७ रुपये प्रति किलोग्राम हो गईं, जिससे आम जनता पर आर्थिक दबाव बढ़ा है। विपक्ष का तर्क है कि गन्ने को ईंधन उत्पादन के लिये मोड़ने से बाजार में शर्करा की आपूर्ति घट गई और कीमतों में उछाल आया। इस संदर्भ में उन्होंने सरकार से मांग की है कि नीति के प्रभावों की पुनः समीक्षा की जाए।

सरकार ने पहले कहा था कि इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम सुरक्षित, उपभोक्ता‑हितैषी और आर्थिक रूप से लाभदायक है, जैसा कि २३ जून २०२६ को जारी बयान में कहा गया था। परन्तु शिलॉन्ग में ३० जून को वायरल हुए वीडियो ने बिर्नीहाट के इथेनॉल प्लांट में अत्यधिक प्रदूषण को उजागर किया, जिससे इस नीति की पर्यावरणीय लागत पर भी चर्चा हुई। इसके अलावा, २९ जून को एआईकेएस की बैठक में भारत‑अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता, चावल‑इथेनॉल ब्लेंडिंग और किसानों की मृत्यु जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई, जहाँ इथेनॉल नीति को किसानों के लिए जोखिमपूर्ण बताया गया।

इन सभी घटनाओं के बीच, वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बावजूद पेट्रोल की कीमतों में कोई कमी नहीं आई, जिससे नीति की आर्थिक प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते हैं। विपक्ष ने सरकार से आग्रह किया है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग से उत्पन्न शर्करा की कमी को दूर करने हेतु वैकल्पिक उपाय अपनाए जाएँ और पेट्रोल की कीमतों में वास्तविक कटौती की जाए। इस प्रकार, नीति निर्माताओं को उपभोक्ता, किसान और पर्यावरण के हितों को संतुलित करने के लिए व्यापक पुनरावलोकन करना आवश्यक है।