गुरिंदरवीर ने अपने करियर के मध्य में 10.1 सेकंड की तेज़ दौड़ से राष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम बनाया और एशियन खेलों के लिए अपनी तैयारी को नई दिशा दी। वह अब वयोवृद्ध धावक के रूप में अपने अनुभव को युवा पीढ़ी के साथ साझा करने का लक्ष्य रखता है, परंतु इस उम्र में शारीरिक थकान और चोटों का जोखिम बढ़ जाता है। इन चुनौतियों के बावजूद, वह अपने प्रशिक्षण को निरंतर जारी रखता है और हर दिन अपने समय को बेहतर बनाने का प्रयास करता है।
वर्तमान में गुरिंदरवीर को कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिनमें मांसपेशियों की चोट और पुनरावृत्तियों की संभावना शामिल है। यह स्थिति ओड़िशा के उन परिवारों की कहानी से मिलती-जुलती है, जहाँ किडनी रोग और गरीबी ने कई युवा को अपने सपनों से दूर कर दिया है। ऐसे सामाजिक और आर्थिक दबावों को देखते हुए, धावकों को न केवल शारीरिक बल्कि आर्थिक सहायता की भी आवश्यकता है, जिससे वे अपने लक्ष्य पर टिके रह सकें।
गुरिंदरवीर ने खेल प्रबंधन निकायों से पारदर्शिता और उचित समर्थन की मांग की है, जो मेहली मिस्त्री द्वारा टैटा ट्रस्ट्स के शासन में उठाए गए प्रश्नों के समान है। वह चाहते हैं कि खेल संस्थाएँ खिलाड़ियों की स्वास्थ्य देखभाल, वित्तीय सहायता और प्रशिक्षण सुविधाओं में सुधार लाएँ। इस प्रकार, उनका संघर्ष केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय खेल नीति में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बन सकता है।

