उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण द्वारा आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन को यमुना जलमग्नभूमि में २०१६ के विश्व संस्कृति महोत्सव के दौरान हुए पर्यावरणीय नुकसान के लिए दण्डित करने वाले आदेश को रद्द कर दिया। न्यायालय ने कहा कि उस समय से ही जलमग्नभूमि का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ चुका था और फाउंडेशन को अतिरिक्त दायित्व नहीं देना चाहिए। इस निर्णय के साथ ही दिल्ली विकास प्राधिकरण को पाँच करोड़ रुपये की राशि फाउंडेशन को वापस करने का निर्देश दिया गया।

यह फैसला न्यायिक प्रणाली में पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करता है, क्योंकि कुछ हफ्ते पहले ही उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल के उन आदेशों को निरस्त किया था, जिनमें फर्जी कृत्रिम बुद्धिमत्ता‑जनित न्यायिक पूर्वनिर्णयों का प्रयोग किया गया था। इस प्रकार, न्यायालय ने झूठी तकनीकी जानकारी के आधार पर लिये गये निर्णयों को अस्वीकार कर, न्याय की शुद्धता को पुनः स्थापित किया।

यमुना नदी के किनारे हाल ही में हुई दो घटनाएँ—यमुना एक्सप्रेसवे पर कार का उलटना और दिल्ली में यमुना पुल से कूदने वाले व्यक्ति की खोज‑बीन—इस क्षेत्र की सुरक्षा और पर्यावरणीय चुनौतियों को उजागर करती हैं। इन घटनाओं ने सार्वजनिक सुरक्षा, बुनियादी ढाँचे की मजबूती और जलमग्नभूमि के संरक्षण की आवश्यकता को दोहराया है। न्यायालय का यह व्यापक दृष्टिकोण न केवल पर्यावरणीय न्याय को सुदृढ़ करता है, बल्कि भविष्य में समान विवादों के समाधान के लिए एक स्पष्ट मार्गदर्शक भी स्थापित करता है।