यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया ने सुभाष चंद्र की दिवालिया योजना के खिलाफ मतदान किया, जिसमें कैनरा बैंक और एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस जैसे अन्य लेनदार भी शामिल थे। उन्होंने इस योजना को राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल (NCLT) के समक्ष अस्वीकृत करने का प्रस्ताव रखा, जिससे कर्ज पुनर्संरचना प्रक्रिया में पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित हो सके। इस कदम का मुख्य उद्देश्य कर्जदारों के हितों की रक्षा करना और अनावश्यक वित्तीय जोखिमों से बचना है।
पिछले कुछ हफ्तों में वित्तीय क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं। २४ जून को सिटी यूनियन बैंक ने ५०० करोड़ रुपये की पूंजी जुटाने के लिए योग्य संस्थागत प्लेसमेंट (QIP) की योजना को मंजूरी दी, जिससे बाजार में तरलता बढ़ी। इसी दौरान २ जुलाई को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने 'विकसित भारत रोजगार' योजना शुरू की, जिसका उद्देश्य गरीब वर्ग को रोजगार और आजीविका प्रदान करना है। ये पहलें दर्शाती हैं कि वित्तीय संस्थान सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को संतुलित करने की कोशिश कर रहे हैं।
टॉवरिंग ग्राउंड २० (TG20) लीग को भी बीसीसीआई की स्वीकृति मिली है, जिससे खेल और वित्तीय प्रायोजन के बीच संबंध स्पष्ट हुआ। इस संदर्भ में, यूनियन बैंक का कदम यह संकेत देता है कि वह कर्ज पुनर्संरचना में न्यायिक प्रक्रिया का समर्थन करता है। NCLT के सामने इस योजना की मंजूरी को चुनौती देना, कर्जदारों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

