नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा लागू की गई नई और संशोधित त्रि-भाषा नीति (Three-Language Policy) एक बार फिर कानूनी विवादों के घेरे में आ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कक्षा 6 से दो भारतीय भाषाओं के अध्ययन को अनिवार्य बनाने वाली इस नीति को चुनौती देने वाली नई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए CBSE और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत ने इस मामले में दो हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और बेंच का रुख
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इन नई याचिकाओं पर केंद्र सरकार, CBSE और NCERT को नोटिस जारी किया है।
अंतिम तिथि: कोर्ट ने मामले की विस्तृत सुनवाई के लिए 29 जुलाई की तारीख तय की है।
कोई अंतरिम रोक नहीं: हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस स्तर पर CBSE के सर्कुलर के संचालन पर कोई अंतरिम रोक (Interim Stay) लगाने से इनकार कर दिया है।
CBSE की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को भरोसा दिलाया कि बोर्ड दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल कर देगा।
क्या है विवाद की मुख्य वजह?
यह पूरा विवाद CBSE के शैक्षणिक सत्र 2026-27 के माध्यमिक विद्यालय पाठ्यक्रम और 9 अप्रैल व 4 मई को जारी सर्कुलर से जुड़ा है। इसके तहत:
दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य: कक्षा 6 से छात्रों के लिए ऐसी दो भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य कर दिया गया है जो "भारत की मूल भाषाएं" (Native to India) हों।
विदेशी भाषाएं रातोंरात बंद: दिल्ली-एनसीआर के कई निजी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के माता-पिता का आरोप है कि नया सत्र शुरू होने के बाद स्कूलों ने अचानक विदेशी भाषाओं (जैसे फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश) को बंद कर दिया और छात्रों को उनकी इच्छा के विरुद्ध संस्कृत या अन्य भारतीय भाषाएं पढ़ने का निर्देश दे दिया। इससे बच्चों में अत्यधिक मानसिक तनाव और अनिश्चितता का माहौल है।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलीलें
वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर और अधिवक्ता तृप्ति टंडन के माध्यम से दायर इस याचिका में कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं:
शिक्षा के अधिकार (RTE) कानून का उल्लंघन: याचिका के अनुसार, शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 29 के तहत केवल NCERT ही प्रारंभिक शिक्षा (कक्षा 6 सहित) का पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए अधिकृत शैक्षणिक संस्था है। CBSE द्वारा तैयार यह पाठ्यक्रम बिना कानूनी मंजूरी के लागू किया गया है।
मनमाना और असंवैधानिक बदलाव: शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बाद बीच में अचानक नियमों को बदलना और स्कूलों को केवल 7 दिनों के भीतर इसे लागू करने का निर्देश देना पूरी तरह मनमाना है।
अध्ययन सामग्री की कमी: खुद NCERT ने अभी तक नए पाठ्यक्रम के लिए किताबें और आवश्यक अध्ययन सामग्री तैयार नहीं की है। बिना किताबों के इस नीति को जमीन पर उतारना अव्यावहारिक है।
समानता के अधिकार पर चोट: यह नीति मध्यमवर्गीय छात्रों के साथ भेदभाव करती है। महंगे इंटरनेशनल बोर्ड के छात्रों को विदेशी भाषाएं सीखने का विकल्प मिल रहा है, जबकि CBSE के छात्रों को इससे वंचित किया जा रहा है।
"यह नीति 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति' (NEP) 2020 की मूल भावना के भी विपरीत है, जो छात्रों को लचीलापन और अपनी पसंद के विषय चुनने की आजादी देती है। अंग्रेजी को 'गैर-मूल' (Non-native) भाषा मानकर छात्रों को अंग्रेजी और विदेशी भाषा में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर करना तर्कहीन है।" — याचिकाकर्ताओं की दलील
पहले से लंबित है एक और याचिका
यह पहला मौका नहीं है जब इस नीति को चुनौती दी गई है। इससे पहले मई में भी सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाएं (जिसमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं शामिल हों) अनिवार्य करने के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर केंद्र को नोटिस जारी किया था।
CBSE ने हाल ही में स्पष्ट किया था कि वर्तमान में कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीसरी भाषा (R3) कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा का मुख्य विषय नहीं होगी, लेकिन पास सर्टिफिकेट पाने के लिए स्कूल-स्तरीय मूल्यांकन को पास करना अनिवार्य होगा।
