राज्य सरकार ने हाल ही में एक नई नीति लागू की है, जिसके तहत सभी सार्वजनिक परिवहन के ड्राइवरों को मराठी भाषा का कार्यात्मक ज्ञान होना अनिवार्य किया गया है। इस आदेश का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यात्रियों और ड्राइवरों के बीच संवाद सुगम रहे, जिससे सुरक्षा और सेवा की गुणवत्ता में सुधार हो सके। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने इस नीति को लेकर कहा कि उनका लक्ष्य ड्राइवरों को भाषा विशेषज्ञ बनाना नहीं, बल्कि उन्हें बुनियादी संवाद कौशल प्रदान करना है, जिससे दैनिक कार्य में कोई बाधा न आए।

यह कदम पिछले कुछ हफ्तों में उठाए गए कई भाषा-संबंधी मांगों के साथ जुड़ा हुआ है। जुलाई में महाराष्ट्र राज्य में मराठी भाषा में SIR फॉर्म की मांग करने वाले MES ने सरकार को स्थानीय भाषा में दस्तावेज़ीकरण की आवश्यकता पर बल दिया था, जबकि अन्य राज्यों में भी समान मांगें उठ रही थीं। इसके अलावा, जुलाई के शुरुआती दिनों में इंग्लैंड के मेयरों को व्यापक अधिकार देने की चर्चा भी हुई, जो स्थानीय प्रशासन में भाषा की भूमिका को उजागर करती है। इन सभी घटनाओं ने भाषा नीति को एक संवेदनशील मुद्दा बना दिया है, जहाँ विभिन्न सामाजिक समूहों की अपेक्षाएँ और सरकारी उपाय आपस में टकरा रहे हैं।

नीति के लागू होने के बाद विभिन्न पक्षों से मिश्रित प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। कुछ व्यापार संघों ने कहा है कि यह कदम रोजगार के अवसरों को सीमित कर सकता है, जबकि कई नागरिक समूहों ने इसे स्थानीय संस्कृति के संरक्षण के रूप में सराहा है। फडनवीस ने आगे कहा कि सरकार इस नीति को लचीले ढंग से लागू करेगी और आवश्यकतानुसार प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित करेगी, जिससे सभी ड्राइवरों को सहजता से अनुकूलित किया जा सके। अंततः, यह देखना बाकी है कि यह भाषा अनिवार्यता किस हद तक सार्वजनिक परिवहन की कार्यक्षमता और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देगी।