कर्नाटक में मुख्यमंत्री डीके शिवाकुमार द्वारा शुरू किए गए ‘प्रजा सेवा अभियान’ के उद्घाटन समारोह में एक विधायक ने सार्वजनिक शिकायत सभा में अनादरपूर्ण व्यवहार किया। जब नागरिकों ने अपने समस्याओं को प्रस्तुत किया, तो वह विधायक ने कठोर स्वर में कहा, “आवेदन दें और चले जाएँ”, जिससे सभा में उपस्थित लोगों में गुस्सा और असंतोष की लहर दौड़ गई। इस प्रकार की भाषा न केवल जनता के विश्वास को तोड़ती है, बल्कि सरकार की सेवा‑उन्मुख नीति के विपरीत भी है।

इस घटना के बाद सामाजिक मीडिया पर तेज़ी से प्रतिक्रिया आई, जहाँ कई नागरिकों ने विधायक के इस रवैये की निंदा की और सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग की। इसी समय, चुनाव आयोग ने कर्नाटक में मतदाता सूची के डिजिटलीकरण को तेज़ किया है, जिससे मतदान प्रक्रिया में पारदर्शिता और सुविधा बढ़ेगी। लेकिन डिजिटल पहल के बावजूद, जनता के सामने ऐसे अभद्र व्यवहार को देखते हुए प्रशासन की संवेदनशीलता पर सवाल उठते हैं।

पिछले कुछ हफ्तों में हरियाणा में कांग्रेस विधायक के कार्यालय पर गोलीबारी जैसी घटनाओं ने कानून व्यवस्था की गिरावट को उजागर किया, जबकि कर्नाटक में इस प्रकार की घटना सार्वजनिक सेवा के मूल सिद्धांतों को चुनौती देती है। यह स्पष्ट है कि केवल तकनीकी सुधार ही पर्याप्त नहीं, बल्कि राजनेताओं को जनता के प्रति सम्मानजनक व्यवहार अपनाना चाहिए। इस प्रकार, विधायक के इस अभद्र कार्य को रोकने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उचित अनुशासनात्मक कदम उठाना आवश्यक है, ताकि ‘प्रजा सेवा अभियान’ का वास्तविक उद्देश्य साकार हो सके।