नई दिल्ली:
भारत में प्रदूषण कम करने और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने के नाम पर लागू की गई E20 पेट्रोल (20% एथेनॉल और 80% पेट्रोल) नीति अब आम वाहन मालिकों के लिए जी का जंजाल बनती जा रही है। सोशल मीडिया से लेकर देश के मैकेनिक गैरेज तक, हर तरफ एथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल के खिलाफ उपभोक्ताओं का गुस्सा फूट रहा है। जनता का आरोप है कि ग्रीन फ्यूल के नाम पर उनके साथ धोखा हो रहा है, जिससे न सिर्फ उनकी जेब कट रही है बल्कि उनकी गाड़ियां भी समय से पहले दम तोड़ रही हैं।
1. कम माइलेज की मार: जेब पर दोहरा झटका
देश भर के कार और बाइक मालिकों की सबसे बड़ी शिकायत माइलेज में भारी गिरावट को लेकर है। लोगों का कहना है कि जब से पेट्रोल पंपों पर E20 ईंधन मिलना शुरू हुआ है, तब से गाड़ियों का माइलेज अचानक गिर गया है।
वैज्ञानिक कारण: पेट्रोल के मुकाबले एथेनॉल की कैलोरीफिक वैल्यू (Calorific Value) काफी कम होती है। इसका सीधा मतलब है कि एथेनॉल उतनी ऊर्जा पैदा नहीं कर पाता जितनी शुद्ध पेट्रोल करता है।
असर: भारी ट्रैफिक और हाईवे पर गाड़ियों को चलाने के लिए इंजन को ज्यादा ईंधन खींचना पड़ता है। सरकारी दावों के मुताबिक माइलेज में सिर्फ 3% से 5% की कमी आनी चाहिए, लेकिन आम जनता का दावा है कि उनकी गाड़ियों का माइलेज 10 से 15 प्रतिशत तक गिर चुका है।
2. इंजन हो रहे डैमेज: पुरानी गाड़ियों के लिए 'धीमा जहर'
एथेनॉल की सबसे खतरनाक प्रवृत्ति यह है कि यह नमी (पानी) को बहुत जल्दी सोखता है। इसकी वजह से गाड़ियों के फ्यूल टैंक और इंजन के भीतर गंभीर समस्याएं खड़ी हो रही हैं:
पुर्जों का गलना: एथेनॉल एक बेहतरीन विलायक (Solvent) है। यह पुरानी गाड़ियों (विशेषकर अप्रैल 2023 से पहले बनी गाड़ियां जो E20 कंप्लायंट नहीं हैं) के रबर पाइप, प्लास्टिक वाशर और फ्यूल लाइन्स को धीरे-धीरे गला देता है।
जंग और चोकिंग: फ्यूल टैंक में नमी आने के कारण जंग (Corrosion) लग रही है, जिससे फ्यूल इंजेक्टर और कंबशन चैंबर जाम हो रहे हैं। कई वाहन मालिकों को कुछ ही हजार किलोमीटर में हजारों रुपये खर्च कर इंजन के पार्ट्स बदलवाने पड़ रहे हैं।
"गाड़ी स्टार्ट होने में दिक्कत कर रही है और पिकअप पूरी तरह खत्म हो चुका है। मैकेनिक का कहना है कि एथेनॉल वाले पेट्रोल ने फ्यूल पंप को सड़ा दिया। सरकार बिना हमारी मर्जी के हमें घटिया तेल महंगे दामों पर बेच रही है।"
— संजय शर्मा, दिल्ली के एक पीड़ित कार मालिक
3. पेट्रोलियम मंत्री चुप, सड़क परिवहन मंत्री आगे? बयानों में उलझी सरकार
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक विरोधाभास तब देखने को मिला, जब इस मामले पर पेट्रोलियम मंत्रालय के बजाय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को डैमेज कंट्रोल के लिए आगे आना पड़ा। इसे लेकर जनता और जानकारों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
हरदीप सिंह पुरी का दावा: पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सोशल मीडिया पर चल रही शिकायतों को 'भ्रामक' और 'पेड कैंपेन' करार देते हुए खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा था कि देश में 20 करोड़ दोपहिया और 20 लाख चौपहिया वाहन बिना किसी समस्या के इस ईंधन का उपयोग कर रहे हैं।
नितिन गडकरी का विरोधाभास: हरदीप पुरी के इस दावे के ठीक बाद सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर लिया कि "एथेनॉल की कम कैलोरीफिक वैल्यू के कारण माइलेज पर असर पड़ेगा।" हालांकि, उन्होंने इंजन डैमेज के दावों को खारिज करते हुए चुनौती दी कि कोई एक भी गाड़ी दिखाए जो E20 से खराब हुई हो।
बड़ा सवाल: जब ईंधन का पूरा विभाग पेट्रोलियम मंत्रालय (Hardeep Singh Puri) के अधीन आता है, तो सड़क परिवहन मंत्री (Nitin Gadkari) को इस नीति के बचाव में एथेनॉल के ब्रांड एंबेसडर की तरह क्यों उतरना पड़ रहा है? जानकारों का मानना है कि चूंकि गडकरी लंबे समय से फ्लेक्स-फ्यूल और वैकल्पिक ऊर्जा के पैरोकार रहे हैं, इसलिए सरकार उनकी छवि का इस्तेमाल कर जनता के गुस्से को शांत करना चाहती है।
4. क्या सरकार बना रही है जनता को बेवकूफ?
आम उपभोक्ताओं के बीच इस बात को लेकर गहरी नाराजगी है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग का सीधा आर्थिक फायदा जनता को क्यों नहीं मिल रहा है:
कीमत में कोई कटौती नहीं: एथेनॉल का उत्पादन पेट्रोल से काफी सस्ता पड़ता है। जब सरकार पेट्रोल में 20% सस्ता एथेनॉल मिला रही है, तो पेट्रोल के दाम कम क्यों नहीं किए जा रहे? जनता से शुद्ध पेट्रोल की कीमत वसूल कर उन्हें मिलावटी (ब्लेंडेड) ईंधन क्यों दिया जा रहा है?
कोई विकल्प नहीं: पेट्रोल पंपों पर उपभोक्ताओं को यह चुनने का अधिकार नहीं दिया गया है कि वे शुद्ध पेट्रोल लेना चाहते हैं या E20। बिना किसी तैयारी और बिना किसी विकल्प के इस ईंधन को हर किसी पर थोप दिया गया है।
वॉरंटी का चक्कर: अप्रैल 2023 से पहले की गाड़ियों पर कंपनियां एथेनॉल से होने वाले नुकसान की वॉरंटी नहीं दे रही हैं। ऐसे में करोड़ों पुरानी गाड़ियों के मालिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
निष्कर्ष
भारत का एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम कागजों पर और पर्यावरण के लिहाज से भले ही एक मास्टरस्ट्रोक दिखे, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बुनियादी ढांचे और पारदर्शिता की कमी ने इसे जनता के लिए एक सिरदर्द बना दिया है। जब तक सरकार इसकी कीमतों में कमी नहीं करती और पुरानी गाड़ियों के पुर्जों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करती, तब तक जनता इसे 'ग्रीन फ्यूल' नहीं बल्कि अपनी जेब पर 'एथेनॉल टैक्स' ही समझेगी।

