संबलपुर विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग ने हाल ही में एक विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया, जिसमें कोयला खनन क्षेत्रों में प्रदूषित वायु और जल का पुरुष प्रजनन क्षमता पर हानिकारक प्रभाव दर्शाया गया है। शोध में यह पाया गया कि खनन से निकलने वाले सूक्ष्म कण, सल्फर डाइऑक्साइड और भारी धातुएँ शुक्राणु के आकार, गति और जीवित रहने की क्षमता को गंभीर रूप से घटा देती हैं। परिणामस्वरूप, प्रभावित क्षेत्रों में बांझपन की दर में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।
यह अध्ययन पिछले कुछ महीनों में प्रकाशित कई स्वास्थ्य‑पर्यावरण रिपोर्टों के साथ तालमेल रखता है। उदाहरण के तौर पर, लंदन में वायु प्रदूषण से जुड़ी मृत्यु दर में ४० प्रतिशत गिरावट का आंकड़ा सामने आया था, परन्तु वही अध्ययन यह भी दर्शाता है कि प्रदूषण के दीर्घकालिक प्रभाव अभी भी पूरी तरह समझे नहीं गए हैं। इसी प्रकार, कश्मीर में प्रजनन सहायता केंद्रों में हुई त्रासदी ने स्वास्थ्य‑सेवा के नियमन की आवश्यकता को उजागर किया, जबकि म्यानमार में जेड खनन स्थल पर हुई पहाड़ी गिरावट ने पर्यावरणीय आपदाओं के मानवीय परिणामों को रेखांकित किया। इन सभी घटनाओं ने यह सिद्ध किया है कि पर्यावरणीय जोखिमों का स्वास्थ्य पर बहुआयामी प्रभाव होता है।
संबलपुर विश्वविद्यालय के प्रमुख वैज्ञानिकों ने इस शोध के आधार पर सिफारिशें भी प्रस्तुत की हैं। उन्होंने कहा कि कोयला खनन क्षेत्रों में कड़े उत्सर्जन मानकों को लागू किया जाना चाहिए, साथ ही स्थानीय जनसंख्या के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच और प्रजनन क्षमता की निगरानी अनिवार्य होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, सरकार को खनन‑प्रदूषण नियंत्रण के लिए नई तकनीकों को अपनाने और प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वास कार्य तेज़ी से करने की आवश्यकता है। यदि इन उपायों को समय पर लागू किया गया तो भविष्य में पुरुष प्रजनन स्वास्थ्य को बचाया जा सकता है और सामाजिक‑आर्थिक बोझ को कम किया जा सकता है।

