बाल विवाह भारत में एक गंभीर सामाजिक बुराई है, विशेषकर पिछड़े वर्ग, OBC, दलित और कश्यप समाज में यह समस्या अधिक देखी जाती है। 2006 का बाल विवाह रोकथाम अधिनियम (PCA) स्पष्ट रूप से 18 वर्ष से कम आयु के लड़के‑लड़की की शादी को अवैध घोषित करता है। इस अधिनियम के तहत शादी को रद्द करने, दंडित करने और जुर्माना लगाने की व्यवस्था है। यदि कोई शादी 18 वर्ष से कम उम्र में हुई है, तो वह शादी कानूनी रूप से अमान्य मानी जाएगी।

कानून के साथ-साथ कई सरकारी योजनाएँ भी बाल विवाह रोकने में मदद करती हैं। बाल विवाह रोकथाम योजना के तहत राज्य सरकारें जागरूकता कार्यक्रम, शिक्षा सहायता और आर्थिक प्रोत्साहन देती हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ‘बाल अधिकार पोर्टल’ पर आप शिशु विवाह के शिकार महिलाओं के लिए उपलब्ध सहायता राशि, स्कॉलरशिप और कौशल प्रशिक्षण के बारे में जानकारी पा सकते हैं।

व्यावहारिक कदम उठाने के लिए आप निम्नलिखित उपाय अपना सकते हैं:

  1. समुदाय में जागरूकता: स्कूल, पंचायत और स्थानीय NGOs के साथ मिलकर ‘बाल विवाह मुक्त गाँव’ अभियान चलाएँ।
  2. शिक्षा को प्राथमिकता दें: लड़कियों को कम से कम 10वीं तक पढ़ाने के लिए राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल से आर्थिक सहायता प्राप्त करें।
  3. हेल्पलाइन पर रिपोर्ट करें: यदि किसी बाल विवाह की सूचना मिले तो 1098 (बाल अधिकार हेल्पलाइन) या 181 (राष्ट्रीय महिला हेल्पलाइन) पर तुरंत रिपोर्ट करें।
  4. कानूनी सहायता: राष्ट्रीय कानूनी सहायता योजना (NALSA) के तहत मुफ्त वकील की मदद लें—विवाह रद्द करने के लिए ‘सिविल केस’ दाखिल किया जा सकता है।

अंत में, यह याद रखें कि बाल विवाह केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक एवं आर्थिक असमानताओं का परिणाम है। यदि आप या आपका कोई परिचित इस समस्या से जूझ रहा है, तो तुरंत स्थानीय पुलिस, महिला आयोग या राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो से संपर्क करें। सामुदायिक सहयोग, शिक्षा और कानूनी जागरूकता से ही हम इस बुराई को जड़ से खत्म कर सकते हैं।