आरबीआई द्वारा हाल ही में शुरू की गई विदेशी मुद्रा उधारी योजना, अर्थात् एफसीएनआर‑बी, ने भारतीय बैंकों को विदेशी मुद्रा जमा के माध्यम से सस्ते निधि स्रोत प्रदान किए हैं। इस पहल के कारण बैंकों ने महँगे थोक जमा को क्रमशः घटाना शुरू किया है, जिससे उनकी निधि लागत में उल्लेखनीय कमी आई है। बड़े बैंकों ने इस बदलाव से लाखों रुपये की बचत की रिपोर्ट की है, जिससे उनकी लाभप्रदता में सुधार की संभावनाएँ बढ़ गई हैं।
पिछले कुछ हफ्तों में एनआरआई निवेशकों ने एफसीएनआर‑बी योजना को अपनाते हुए बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा जमा किया, जबकि अमेरिका और सिंगापुर में रहने वाले भारतीयों को टैक्स के डर ने पहले हिचकिचाहट पैदा की थी। हालांकि, आरबीआई की स्पष्ट दिशा-निर्देशों और कर संबंधी स्पष्टता ने इन निवेशकों का भरोसा जीत लिया, जिससे जमा में तेज़ी आई। इस संदर्भ में १५ जून को प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया था कि बैंकों में डेरिवेटिव बेत्स की खरीदारी बढ़ी, जिससे बाजार में बुलिश रुझान स्पष्ट हुआ।
भविष्य में बैंकों की अपेक्षा है कि वे एफसीएनआर‑बी विंडो के माध्यम से बड़ी मात्रा में निधि जुटाएँगे, जिससे उनकी तरलता स्थिति और भी मजबूत होगी। यह रणनीतिक बदलाव न केवल लागत को कम करेगा, बल्कि बैंकों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाकर वित्तीय बाजार में उनकी स्थिति को सुदृढ़ करेगा। साथ ही, इस कदम से भारतीय वित्तीय प्रणाली में विदेशी निवेशकों का विश्वास भी बढ़ेगा, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक विकास को गति मिलेगी।
