अगस्त के शुरुआती दिनों में सोने की कीमतों में उल्लेखनीय उछाल देखा गया, जिसका मुख्य कारण कमजोर अमेरिकी डॉलर और मौद्रिक नीति में ढील की संभावनाएँ रही। वैश्विक स्तर पर भू‑राजनीतिक तनावों ने निवेशकों को सुरक्षित आश्रय की ओर मोड़ा, जिससे सोने की मांग में वृद्धि हुई। साथ ही, कई केंद्रीय बैंकों ने अपने आरक्षित पोर्टफोलियो में सोने का हिस्सा बढ़ाया, जिससे कीमतों को अतिरिक्त समर्थन मिला।
चीन की निरंतर मजबूत मांग और भारत में आने वाले त्योहारी व विवाह सीजन ने भी इस उछाल को तेज किया। पिछले सप्ताह जं&क में वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम द्वितीय की प्रगति को लेकर अधिकारियों ने गाँव‑स्तर पर मूल्यांकन शुरू किया, जिससे ग्रामीण आर्थिक स्थिति में सुधार की आशा बढ़ी और निवेशकों का भरोसा बढ़ा। वहीं, डॉइचे बैंक ने सोने की कीमतों के लिए नई भविष्यवाणी जारी की, जिसमें यदि अमेरिकी फेडरल रिज़र्व कड़ी नीति अपनाता है तो कीमतें $3,800 तक गिर सकती हैं, परन्तु भारतीय बाजार में यह प्रभाव सीमित रहा।
दीर्घकालिक दृष्टिकोण से सोने की कीमतें अभी भी बुलिश बनी हुई हैं। आरक्षित विविधीकरण, महंगाई की चिंता और डॉलर से बाहर निकलने की प्रक्रिया जैसे संरचनात्मक कारक सोने को आकर्षक बनाते हैं। यद्यपि अल्पकालिक सुधार की संभावना बनी हुई है, परन्तु मौसमी खरीदारी और सुरक्षित निवेश की प्रवृत्ति के कारण सोने का दीर्घकालिक रुझान सकारात्मक ही रहेगा।
