जैराम रेश ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जारी किए गए राष्ट्रीय सर्वेक्षण के निष्कर्षों को उजागर करते हुए कहा कि खनन, बुनियादी ढांचा और औद्योगिक परियोजनाओं ने हाथी के प्राकृतिक आवास और प्रवास मार्गों को व्यवस्थित रूप से नष्ट कर दिया है। यह विनाश न केवल वन्यजीवों को खतरे में डालता है, बल्कि स्थानीय किसानों और ग्रामीण समुदायों के साथ संघर्ष भी बढ़ाता है। रेश ने इस बात पर बल दिया कि संरक्षण के लिए स्पष्ट नीति और वित्तीय समर्थन की आवश्यकता है, न कि केवल शब्दों में आश्वासन।

पिछले कुछ हफ्तों में तेलंगाना में हाथी ट्रायल वॉक पर ट्रैफिक प्रतिबंध और ओडिशा के सतकोसिया अभयारण्य में एक वन कर्मचारी की मौत जैसी घटनाएँ इस समस्या की गंभीरता को दर्शाती हैं। इन घटनाओं ने जनता में वन्यजीव सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाई है, परन्तु रेश का मानना है कि सरकार की कार्रवाई अभी भी अपर्याप्त है। उन्होंने कहा कि यदि हाथी के मार्गों को पुनर्स्थापित नहीं किया गया तो भविष्य में और अधिक मानव-वन्यजीव टकराव की संभावना बढ़ेगी।

राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में कई प्रमुख वन्यजीव अभयारण्यों में बाधाओं की पहचान की गई है, जिसमें तेलंगाना के कुछ खनन क्षेत्रों में स्थापित बाधाएँ प्रमुख हैं। रेश ने सरकार से आग्रह किया कि वे इन बाधाओं को हटाने के लिए त्वरित कदम उठाएँ और स्थानीय समुदायों को पुनर्वास एवं वैकल्पिक आजीविका के अवसर प्रदान करें। साथ ही, उन्होंने कहा कि न्यायालय के आदेशों का पूर्ण पालन करना आवश्यक है, ताकि भारत में हाथी संरक्षण को वास्तविकता में बदला जा सके।