जॉर्डन में आयोजित अमेरिकी मध्यस्थता वाली वार्ता में सीरियाई और इज़राइली प्रतिनिधियों ने आपसी तनाव को कम करने के लिए कई बिंदुओं पर चर्चा की। सीरियाई पक्ष ने इज़राइल के निरंतर हमलों को रोकने, सीरियाई क्षेत्रों से इज़राइली सेना को हटाने, १९७४ के समझौते को पुनर्स्थापित करने और सीरिया की संप्रभुता का सम्मान करने की स्पष्ट मांग रखी। इज़राइली प्रतिनिधि इन मांगों को सुनते हुए, सुरक्षा चिंताओं को दूर करने के लिए वैकल्पिक उपायों पर विचार करने को तैयार दिखे।
यह वार्ता कई पूर्व घटनाओं के संदर्भ में हुई, जहाँ डोनाल्ड ट्रम्प के सीरिया‑हिज़्बुल्लाह को लेकर प्रस्ताव ने क्षेत्रीय चिंताओं को उजागर किया था। साथ ही, इज़राइल ने २०२४ के अंत से दक्षिणी सीरिया में एक सुरक्षा क्षेत्र स्थापित किया था, जिसे वह अपने सुरक्षा हितों के लिए आवश्यक मानता है। बेंजामिन नेतन्याहू ने भी कहा था कि इज़राइल की सेना लेबनान, सीरिया और गाज़ा में तब तक रहेगी जब तक आवश्यक सुरक्षा सुनिश्चित न हो जाए।
जॉर्डन के मध्यस्थता प्रयासों से आशा की जा रही है कि दोनों पक्ष आपसी समझौते पर पहुँच सकें और दीर्घकालिक शांति स्थापित हो। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इज़राइल सीरियाई क्षेत्रों से अपनी सेना को हटाने और १९७४ के समझौते को पुनः लागू करने के कदम उठाता है, तो क्षेत्र में तनाव घट सकता है। दूसरी ओर, सीरिया को भी अपने आंतरिक सुरक्षा को लेकर इज़राइल के साथ संवाद जारी रखने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में बड़े संघर्ष से बचा जा सके।

