किरन रिजीजू ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने किसी विरोधी नेता को ‘दिमागी नक्सल’ नहीं कहा, परन्तु महबूबा मुफ़्ति ने इस स्पष्टीकरण को उल्टा लेकर स्वयं को वही शब्द दिया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 के समर्थन में उनका दृढ़ रुख ही उन्हें इस प्रकार के आरोपों का सामना करवा रहा है, और यह उनके विचारों की स्वतंत्रता का प्रतीक है। यह बयान उनके पिछले बयानों के साथ संगत है, जहाँ उन्होंने जम्मू और कश्मीर को क्षेत्रीय शांति का पुल बनाने की बात की थी।

महबूबा मुफ़्ति ने पहले भी केंद्र सरकार से आग्रह किया था कि जम्मू और कश्मीर की रणनीतिक स्थिति का उपयोग करके पाकिस्तान और चीन के साथ संबंधों को सुदृढ़ किया जाए, तथा क्षेत्र को युद्धस्थल के बजाय शांति का सेतु बनाया जाए। उन्होंने इस संदर्भ में कई बार कहा था कि राज्य को ‘सेतु‑शांति’ बनाना चाहिए, न कि ‘युद्ध‑मैदान’। अब अनुच्छेद 370 के समर्थन पर उनका यह नया बयान उनके राजनीतिक साहस को दर्शाता है, परन्तु विपक्षी दलों ने इसे असहज कर दिया है।

इस घटना से पार्टी के भीतर और बाहरी समीक्षकों के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। कई विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग राजनीतिक संवाद को और अधिक ध्रुवीकरण कर सकता है, जबकि कुछ ने कहा कि यह बयान महबूबा मुफ़्ति की विचारधारा की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। भविष्य में यह देखना होगा कि यह विवाद उनके आगामी चुनावी रणनीति को कैसे प्रभावित करता है और क्या यह जम्मू और कश्मीर के मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा को जन्म देगा।