कोटा में आयोजित अपने विशेष कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने मनुस्मृति पर टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने कहा कि यह ग्रंथ महिलाओं के अधिकारों के विरुद्ध है। इस बयान ने राष्ट्रीय जनसंघ के कई वरिष्ठ नेताओं को चौंका दिया, जिन्होंने इसे सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों के खिलाफ मानते हुए तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि ऐसे बयानों से सामाजिक एकता और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचती है, और यह राजनीति में धर्म के उपयोग को बढ़ावा देता है।
भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता हिमंत बिस्वा सरमा ने सार्वजनिक मंच पर राहुल गांधी के इस बयान को प्रश्नवाचक किया और उनसे स्पष्ट उत्तर माँगा। उन्होंने कहा कि यदि वह महिलाओं के अधिकारों की बात कर रहे हैं, तो उन्हें एकसमान नागरिक संहिता के समर्थन में भी खड़ा होना चाहिए, जिससे सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलें। इस बीच कांग्रेस ने पिछले हफ्तों में विदेश नीति और कोटा रैली को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की थी, जिससे राजनीतिक माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया।
यह विवाद राष्ट्रीय राजनीति में धर्म, लिंग समानता और नीति दिशा को लेकर नई बहस को जन्म दे रहा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी की टिप्पणी ने उन्हें धार्मिक संवेदनशीलता के मुद्दे पर कठिन स्थिति में डाल दिया है, जबकि विपक्षी दलों ने इस अवसर का उपयोग सरकार की समग्र नीतियों की आलोचना के लिए किया है। आगे देखना यह रहेगा कि इस विवाद का राजनीतिक समीकरणों पर क्या प्रभाव पड़ेगा और क्या यह मुद्दा आगामी चुनावी रणनीतियों को प्रभावित करेगा।

