सुप्रीम कोर्ट ने आज अपने आदेश में कहा कि जुलाई बीस को दिल्ली में संसद के सामने हुए नीट विरोध में पुलिस द्वारा छात्रों पर अत्यधिक बल प्रयोग करने के आरोपों की गहन जाँच की जानी चाहिए। यह निर्णय उस समय आया जब कई छात्र संगठनों ने परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग की थी और पुलिस की कार्रवाई को अत्यधिक कठोर बताया गया था। कोर्ट ने इस बात पर बल दिया कि लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए और किसी भी नागरिक को उसके अभिव्यक्ति के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

निर्णय के तहत गठित समिति में सेवानिवृत्त न्यायाधीश, पूर्व पुलिस प्रमुख, पूर्व केंद्रीय जांच ब्यूरो निदेशक तथा अन्य विशेषज्ञ शामिल होंगे। इनका कार्यकाल सीमित रहेगा और उन्हें दो महीने के भीतर प्रारम्भिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। समिति को सभी संबंधित दस्तावेज़, वीडियो फुटेज और गवाहों के बयान एकत्र करने का निर्देश दिया गया है, ताकि पुलिस की कार्यवाही में किसी भी प्रकार की अनियमितता का पता लगाया जा सके।

यह कदम पिछले कुछ हफ्तों में हुए कई घटनाक्रमों के प्रकाश में आया है, जैसे कि तेलंगाना में जगर ने पुलिस के अत्याचार को लेकर उठाए गए आरोप और संसद समिति द्वारा परीक्षा सुधार की समयसीमा तय करने की मांग। इन सभी घटनाओं ने छात्रों की सुरक्षा और न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता की आवश्यकता को उजागर किया है। समिति की रिपोर्ट के आधार पर यदि पुलिस के दुरुपयोग की पुष्टि होती है तो कड़ी सजा और सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे, जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।