पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ को अलग‑थलग करने के इशारे को भाजपा की नई शब्दावली बताया। उन्होंने कहा कि ‘शहरी नक्सल’, ‘आंदोलनजीवी’ और ‘टुकड़े‑टुकड़े गैंग’ जैसे शब्द केवल विरोधी दल को बदनाम करने के लिये बनाए गये हैं, जिनका कोई ठोस आधार नहीं है। इस प्रकार की भाषा से सार्वजनिक विमर्श में भ्रम उत्पन्न होता है और वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटता है।

ओडिशा में लगातार बरसते मानसून के कारण शहरी जलभराव की आशंका बढ़ी, जिससे सभी शहरी स्थानीय निकायों को उच्च सतर्कता पर रखा गया। इसी समय, केंद्र सरकार के प्रमुख शब्दों ने स्थानीय प्रशासन को आवश्यक कार्यों से विचलित कर दिया। चिदंबरम की टिप्पणी इस बात को उजागर करती है कि राजनीतिक लेबलिंग से नीतिगत प्राथमिकताएँ धुंधली हो जाती हैं, जबकि जलसंकट जैसी वास्तविक समस्याएँ त्वरित समाधान की मांग करती हैं।

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने ग्रामीण‑शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में बड़ी जीत हासिल की, जबकि शिलांग में रक्षा भूमि के किराए के संकट ने शहरी पुनरुद्धार को रोक दिया। इन घटनाओं ने दिखाया कि विभिन्न राज्यों में सत्ता संघर्ष के दौरान ‘नक्सल’ शब्द का प्रयोग अक्सर विरोधी को कमजोर करने के लिये किया जाता है। चिदंबरम का तर्क इस प्रवृत्ति को चुनौती देता है, यह संकेत देता है कि लोकतांत्रिक बहस में स्पष्ट और तथ्यात्मक भाषा का प्रयोग आवश्यक है।