तेलंगाना में कांग्रेस ने हाल ही में आयोजित एक सभा में वन्दे मातरम् के केवल दो पद्य गाने की परंपरा को दोहराया, जिसे उसने 1937 में केन्द्रीय कार्यकारिणी समिति द्वारा अनुमोदित निर्णय और महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस तथा रवींद्रनाथ टैगोर के विचारों के साथ जोड़ते हुए वैध ठहराया। पार्टी के प्रवक्ता ने कहा कि यह गान राष्ट्रीय भावना को संक्षिप्त रूप में व्यक्त करता है और किसी भी धार्मिक या राजनैतिक विभाजन को नहीं बढ़ावा देता।
इस पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा विरोध किया, यह आरोप लगाते हुए कि कांग्रेस का यह कदम राष्ट्रीय गीत के सम्पूर्ण स्वरूप को घटा रहा है और जनता को भ्रमित कर रहा है। भाजपा के नेता ने कहा कि वन्दे मातरम् के सभी चार पद्य गाए जाने चाहिए, क्योंकि वे स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न चरणों को दर्शाते हैं। इस विवाद के बीच, पिछले कुछ हफ्तों में देश भर में सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दों पर बहसें तेज़ हो रही थीं, जैसे कुचिपुड़ी नर्तकी अक्षरा देवल्ला का राष्ट्रीय सांस्कृतिक दूत बनना और उत्तर कश्मीर में वन्दे भारत ट्रेन को बरामुड़ा तक बढ़ाने की मांग।
त्रिपुरा में निजी प्रैक्टिस पर प्रतिबंध की चर्चा भी इस समय सामाजिक-राजनीतिक विमर्श को और जटिल बना रही है, जहाँ चिकित्सकों और शिक्षकों ने इस कदम के पक्ष में आवाज़ उठाई है। इन सभी घटनाओं के प्रकाश में कांग्रेस ने कहा कि वह राष्ट्रीय गीत के सम्मान को बनाए रखने के साथ-साथ विविधता को भी स्वीकार करती है, और भाजपा के आरोपों को निराधार ठहराते हुए कहा कि उनका उद्देश्य राजनीतिक लाभ के लिए सांस्कृतिक भावनाओं का दुरुपयोग करना है।

