
बंगाल।देश की राजनीति में इन दिनों एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक तरफ महिला सशक्तिकरण और आरक्षण की जोरदार पैरवी, तो दूसरी तरफ एक महिला मुख्यमंत्री को सत्ता से हटाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी गई है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लेकर जिस तरह की राजनीतिक घेराबंदी हो रही है, वह कई सवाल खड़े करती है।
केंद्र की सत्ता, जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं, और कई राज्यों के पुरुष मुख्यमंत्री मिलकर बंगाल की राजनीति में सक्रिय नजर आ रहे हैं। आरोप है कि यह सब केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि एक मजबूत महिला नेतृत्व को कमजोर करने की रणनीति का हिस्सा है।
विडंबना यह है कि यही राजनीतिक धड़े संसद और मंचों पर महिला आरक्षण बिल का जोर-शोर से समर्थन करते हैं। सवाल उठता है कि जब एक महिला नेता सत्ता में है, तब उसे अस्थिर करने की कोशिश क्यों? क्या महिला आरक्षण केवल एक चुनावी मुद्दा बनकर रह गया है?
विश्लेषण बताता है कि यह लड़ाई केवल बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश में राजनीतिक सोच और नैतिकता का आईना बन चुकी है। महिला सशक्तिकरण के नाम पर राजनीति करने वाले दलों की कथनी और करनी में अंतर साफ नजर आता है।
जनता अब यह समझने लगी है कि असली मुद्दा महिला सशक्तिकरण नहीं, बल्कि सत्ता की कुर्सी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या राजनीति में महिलाओं को बराबरी का अधिकार सच में मिलेगा, या यह सिर्फ भाषणों और नारों तक ही सीमित रहेगा?


