कश्यप सन्देश

21 May 2026

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देश और उत्तर प्रदेश के नागरिकों को मिले मुफ्त शिक्षा और मुफ्त चिकित्सा की सुविधा


उत्तर प्रदेश के प्रत्येक नागरिक और उनके परिवार को बेहतर जीवन का अधिकार है। राज्य सरकार को चाहिए कि गरीब, मजदूर, किसान, पिछड़े, वंचित एवं मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चों को निशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराई जाए, ताकि कोई भी बच्चा आर्थिक अभाव के कारण शिक्षा से वंचित न रहे।
इसी प्रकार प्रदेश के सभी नागरिकों को सरकारी अस्पतालों में मुफ्त एवं बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। गंभीर बीमारियों के इलाज, दवाइयों, जांचों और ऑपरेशन की व्यवस्था पूरी तरह निशुल्क हो, जिससे गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ न पड़े।
शिक्षा और स्वास्थ्य किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। यदि प्रदेश का हर नागरिक शिक्षित और स्वस्थ होगा, तभी उत्तर प्रदेश विकास की नई ऊंचाइयों को प्राप्त करेगा।

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आर.सी.निषाद — संपादक
कश्यप संदेश अख़बार, परिवार कानपुर

काहार जाति की कहानी :मनोज कुमार मछवारा की कलम से

श्री मनोज कुमार मछुआरा की कलम से

काहार शब्द का संस्कृत में अर्थ “स्कंध-कारा” है, यानी वह जो अपने कंधों पर वस्तुएं ढोता है। यह जनजाति विभिन्न प्रकार के कार्यों में संलग्न है, जैसे जलाशयों में जल-नट उगाना, मछली पकड़ना, पालकी ढोना और घरेलू सेवा करना। इन विभिन्न पेशों के कारण काहार जाति और उसकी उप-जातियों का एक विस्तृत विश्लेषण किया जा सकता है।

कभी-कभी काहारों को “महरा” भी कहा जाता है, जिसका संस्कृत में अर्थ “महिला” होता है, क्योंकि इन्हें महिलाओं के कक्षों में प्रवेश की अनुमति होती है। इन्हें “धीमार” भी कहा जाता है, जिसका संस्कृत में अर्थ “धिवर” यानी मछुआरा होता है। दक्षिण भारत में इन्हें “भोई” के नाम से जाना जाता है, जिसमें तेलुगु और मलयालम में “बोई” और तमिल में “बोवी” कहा जाता है। कुछ स्थानों पर इन्हें “सिंघारिया” कहा जाता है क्योंकि वे सिंघाड़ा या जल-नट की खेती करते हैं।

पिछली जनगणना में, काहारों ने खुद को पंद्रह उप-जातियों के तहत दर्ज किया था। इनमें बथम, बोट, धीवर, खरवार, महार, धीमार, धुरिया, जैसवार, कामकार, मल्लाह, रैकवार, रवानी, सिंघारिया और तुराई शामिल हैं।

काहार जाति की विविधता और उनके विभिन्न कार्य उन्हें भारतीय समाज में एक अनूठा स्थान देते हैं। उनके विभिन्न नाम और पेशे उनके समाज में महत्वपूर्ण योगदान को दर्शाते हैं। यह जाति, जिसकी जड़ें प्राचीन काल से हैं, आज भी अपनी पहचान और परंपराओं को संजोए हुए है।

मनोज कुमार मछवारा की कलम से, यह कहानी काहार जाति की विशेषताओं और उनके योगदानों को दर्शाती है, जो भारतीय समाज की विविधता और समृद्धि का प्रतीक है।

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