कश्यप सन्देश

1 April 2026

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मौसमकी मार व्यवस्था और बीमा के बीच पिस रहा किसान: तिराहे पर खड़ी अन्नदाता की ज़िंदगी

अगर किसान असुरक्षित, तो देश की खाद्य सुरक्षा भी खतरे मे,

तिराहे पर खड़ा किसान: आसमान, व्यवस्था और बीमा के बीच पिसती ज़िंदगी

पहसा (मऊ )भारत का किसान आज सिर्फ खेत में हल नहीं चलाता अपना भविष्य बोता है, अपने अस्तित्व की लड़ाई भी लड़ रहा है। वह एक ऐसे तिराहे पर खड़ा है, जहाँ एक रास्ता आसमान की मार से भरा है, दूसरा व्यवस्था की अनदेखी से, और तीसरा बीमा कंपनियों की बेरुखी से। इन तीनों के बीच उसका पसीना, उसकी उम्मीदें और उसका भविष्य चुपचाप बिखरता जा रहा है।
जब आसमान में बादल घिरने लगते हैं और मौसम का मिजाज बिगड़ने लगता है, तब किसान के चेहरे की हवाइयाँ उड़ने लगती हैं। माथे पर चिंता की लकीरें साफ झलकने लगती हैं। वह खेत की ओर टकटकी लगाए देखता है और मन ही मन हिसाब लगाने लगता है कि अगर फसल चली गई तो घर कैसे चलेगा? बच्चों की पढ़ाई, बूढ़े माता-पिता की दवा, और परिवार की रोज़मर्रा की जरूरतें कैसे पूरी होंगी? एक-एक बूंद बारिश अब उसे सुकून नहीं, बल्कि डर देने लगती है।
जब खेत में फसल लहलहाने लगती है, तभी अचानक ओलावृष्टि उसे पीट देती है। कभी बेमौसम बारिश उसकी मेहनत को बहा ले जाती है, तो कभी आंधी और चक्रवात उसे जड़ से उखाड़ देते हैं। जिस आसमान की ओर किसान उम्मीद से देखता है, वही कई बार उसकी सबसे बड़ी परीक्षा बन जाता है। यह सिर्फ मौसम का खेल नहीं, बल्कि बदलते पर्यावरण की कठोर सच्चाई है, जिसे अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिनसवाल यह है कि क्या सिर्फ प्रकृति ही इसके लिए दोषी है ?अगर फसल बर्बाद हो जाए, तो क्या किसान को व्यवस्था से सहारा नहीं मिलना चाहिए?
यहीं से दूसरी पीड़ा शुरू होती है। मुआवज़े की घोषणाएँ तो होती हैं, लेकिन ज़मीन तक पहुँचते-पहुँचते वे अक्सर कागज़ों के आंकड़ों में ही सिमट जाती हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात होती है, लेकिन हर किसान को उसका लाभ नहीं मिल पाता। नीतियाँ बनती हैं, पर उनका असर किसान के जीवन में उतना नहीं दिखता, जितना भाषणों �प्रीमियम समय पर कट जाता है, लेकिन जब नुकसान की भरपाई की बारी आती है, तो किसान को सर्वे, कागज़ी प्रक्रिया और इंतज़ार के चक्रव्यूह में डाल दिया जाता है। कई बार मुआवज़ा इतना कम मिलता है कि वह नुकसान की भरपाई तो दूर, घाव को और गहरा कर देता है। विडंबना यह है कि एक ओर बीमा कंपनियां लगातार मालामाल हो रही हैं, तो दूसरी ओर किसान की ज़िंदगी बदहाल होती जा रही है। यह असंतुलन सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक सवाल भी खड़ा करता है। क्या सुरक्षा के नाम पर असुरक्षा का व्यापार किया जा रहा है?
यह स्थिति सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस देश की है, जिसकी आधी से अधिक आबादी आज भी खेती पर निर्भर है।अगर किसान असुरक्षित है, तो देश की खाद्य सुरक्षा भी खतरे में है।
अब समय है कि हम सिर्फ सहानुभूति नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और जिम्मेदारी दिखाएं। सरकार से अपेक्षा है कि वह योजनाओं को ज़मीन पर उतारे, मुआवज़े को त्वरित और पारदर्शी बनाए, और बीमा कंपनियों को जवाबदेह ठहराए।बीमा कंपनियों से अपेक्षा है कि वे लाभ से पहले भरोसे को महत्व दें और समाज से अपेक्षा है कि वह किसान को सिर्फ “अन्नदाता” कहकर नहीं, बल्कि उसके अधिकारों के लिए आवाज़ उठाकर सम्मान दे।
किसान की लड़ाई सिर्फ उसकी अकेले लड़ाई नहीं है यह हम सबकी लड़ाई है। क्योंकि अगर खेत सूने होंगे, तो थाली भी खाली होगी।
यह वक्त है कि तिराहे पर खड़े उस किसान का हाथ थामा जाए,वरना इतिहास गवाह होगा कि हमने उसे संघर्ष में अकेला छोड़ दिया।

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