कश्यप सन्देश

21 May 2026

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देश और उत्तर प्रदेश के नागरिकों को मिले मुफ्त शिक्षा और मुफ्त चिकित्सा की सुविधा


उत्तर प्रदेश के प्रत्येक नागरिक और उनके परिवार को बेहतर जीवन का अधिकार है। राज्य सरकार को चाहिए कि गरीब, मजदूर, किसान, पिछड़े, वंचित एवं मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चों को निशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराई जाए, ताकि कोई भी बच्चा आर्थिक अभाव के कारण शिक्षा से वंचित न रहे।
इसी प्रकार प्रदेश के सभी नागरिकों को सरकारी अस्पतालों में मुफ्त एवं बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। गंभीर बीमारियों के इलाज, दवाइयों, जांचों और ऑपरेशन की व्यवस्था पूरी तरह निशुल्क हो, जिससे गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ न पड़े।
शिक्षा और स्वास्थ्य किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। यदि प्रदेश का हर नागरिक शिक्षित और स्वस्थ होगा, तभी उत्तर प्रदेश विकास की नई ऊंचाइयों को प्राप्त करेगा।

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आर.सी.निषाद — संपादक
कश्यप संदेश अख़बार, परिवार कानपुर

पितृ स्तोत्र ( संस्कृत ): पितृ दोष से मुक्ति के लिए : भाग-2

ए. के. चौधरी की कलम से

ॐ श्री गणेशाय नमः। ॐ श्री गुरुवे नमः। ॐ नमो नारायणाय। ॐ श्री कुलदेवतायै नमः।  

ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगीभ्य एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमोस्तुते।।  
ॐ पितृगणाय विद्महे जगत धारिणी, धीमही तन्नो पितृो प्रचोदयात्।।  

अर्चितानाम मूर्तानां पितृणां दीप्त तेजसां।  
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्य चक्षुषाम्।।1।।  

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीच योस्तथा।  
सप्तर्षिणां तथान्येषां तां नमस्यामि कामदान।।2।।  

मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा।  
ताँ नमस्यामहं सर्वान पितृन्प्सूदधावपि।।3।।  

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वायवग्न्योर्न भसस्तथा।  
धावा पृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतान्जलिः।।4।।  

देवर्षिणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान।  
अक्षय्यस्य सदा दातृण नमस्येहं कृतांज्जलिः।।5।।  

प्रजापते कश्यपाय सोमाय वरूणाय च।  
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांज्जलिः।।6।।  

नमोगणेभ्यः सप्तभयस्तथा लोकेषु सप्तसु।  
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुसे।।7।।  

सोमा धारान पितृगणान योगमूर्तिधारांस्तथा।  
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहं।।8।।  

अग्नि सूपांस्तथैवान्यान नमस्यामि पितृंनहम।  
अग्निषोममयं विश्वं यत एतदशेषतः।।9।।  

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्नि मर्तयः।  
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः।।10।।  

तेभ्योअखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः।  
नमो नमो नमस्ते में प्रसीदन्तु स्वधाभुजः।।11।।  

(इति रूचि मुनि कृत, पितृ स्त्रोत)

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