कश्यप सन्देश

आरक्षण की आवाज़ उठाई… और उजड़ गया पूरा परिवार

पूर्व अभियंता (PWD)मदन गोपाल की दर्दभरी पुकार

कालपी (जालौन)।
“क्या आरक्षण मांगना गुनाह है? क्या अपने समाज के हक़ की बात करना अपराध है?” – यह सवाल है पूर्व सहायक अभियंता (पीडब्ल्यूडी) एवं निषाद समाज विकास समिति, बर्रा कानपुर के अध्यक्ष इंजी. मदन गोपाल का, जिनका आरोप है कि आरक्षण की मांग उठाने की कीमत उन्हें अपने परिवार की खुशियों से चुकानी पड़ी।
वह बताते हैं कि 25 जुलाई 2001 को उनके समाज की बहन की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई। इस घटना के कुछ ही महीनों बाद उनके खिलाफ सतर्कता जांच बैठा दी गई। कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर उन्हें ऐसे मामलों में फंसाया गया, जिनमें उनका कोई दोष नहीं था।
“मेरी पदोन्नति रोकी गई, झूठे मुकदमे दर्ज कराए गए, और मुझे मानसिक रूप से तोड़ने की कोशिश की गई,” वे कहते हैं।
न्यायालय का आदेश भी बेअसर?
11 अगस्त 2004 को थाना कालपी में आईपीसी की धारा 420, 468 और 471 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ। 25 अगस्त 2006 को चार्जशीट दाखिल की गई।
लेकिन माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 19 दिसंबर 2006 को मुकदमे की कार्यवाही पर स्थगन आदेश दे दिया।
इसके बावजूद, मदन गोपाल का आरोप है कि उन्हें न तो पदोन्नति मिली और न ही प्रशासनिक न्याय।
जब दर्द ने छीन ली मां और बेटा
आर्थिक तंगी और मानसिक प्रताड़ना ने उनके परिवार को झकझोर दिया।
वृद्ध और बीमार मां का इलाज समय पर न हो सका। 24 जुलाई 2011 को उन्होंने आत्महत्या कर ली।
“मां के जाने का गम अभी संभाल भी नहीं पाया था कि डेढ़ महीने के भीतर मेरे 25 वर्षीय बेटे की भी तनाव में मौत हो गई,” कहते हुए उनकी आंखें नम हो जाती हैं।
भेदभाव का आरोप

मदन गोपाल का कहना है कि जब प्रदेश सरकार द्वारा कई गंभीर मुकदमे वापस लिए गए, तब भी उनके मामले में राहत नहीं दी गई। उन्होंने प्रेसवार्ता की अनुमति मांगी, शिकायतें कीं, लेकिन आज तक एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई।
वे कहते हैं, “मेरी लड़ाई किसी व्यक्ति से नहीं, अन्याय से है। जिस तरह मेरी बहन की हत्या के दोषियों को सजा मिली, उसी तरह मुझे भी न्याय पर भरोसा है।”
समाज से अपील
आज मदन गोपाल अपने समाज से एकजुट होने की अपील कर रहे हैं।
उनकी आवाज़ में दर्द है, लेकिन उम्मीद भी—
“सत्य देर से ही सही, जीतता जरूर है।

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