
पटना | 27 जनवरी 2026
बिहार निषाद संघ ने निषाद/मल्लाह समाज एवं उसकी विभिन्न उपजातियों को अनुसूचित जनजाति (ST) का लाभ दिए जाने की मांग एक बार फिर प्रमुखता से उठाई है। इस संबंध में मंगलवार को पटना स्थित संघ कार्यालय में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई।
बैठक की अध्यक्षता करते हुए बिहार निषाद संघ के अध्यक्ष लाल बहादुर प्रसाद बिन्द ने कहा कि निषाद समाज के पूर्वज मूल रूप से नदी, जंगल, पहाड़ और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित जीवन जीते रहे हैं। मछली पकड़ना और नौकायन इस समाज का पारंपरिक पेशा रहा है, जो आदिवासी जीवन-शैली की स्पष्ट पहचान है।
उन्होंने बताया कि 1931 तक की जनगणना में निषाद/मछुआरा समाज को अनुसूचित जनजाति के रूप में दर्ज किया गया था। इसके अलावा काका कालेलकर आयोग (1953), चांदा आयोग (1964), लोकुर समिति (1965) और मंडल आयोग (1980) सहित कई आयोगों ने मल्लाह तथा उसकी उपजातियों को जनजातीय श्रेणी में माना है।
संघ के अनुसार बिहार सरकार ने वर्ष 2020-21 में ए.एन.सिन्हा सामाजिक अध्ययन संस्थान से कराई गई एथ्नोग्राफी रिपोर्ट के आधार पर निषाद समाज को आदिवासी मूल का मानते हुए 9 जून 2018 को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय तथा जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार को पत्र भी भेजा था, बावजूद इसके अब तक एसटी आरक्षण लागू नहीं हो पाया है।
बिन्द ने सवाल उठाया कि जब सभी ऐतिहासिक, सामाजिक और प्रशासनिक प्रमाण मौजूद हैं, तो फिर निषाद समाज को आज़ादी के 78 वर्ष बाद भी आरक्षण से वंचित क्यों रखा गया है। उन्होंने कहा कि बिहार में मछुआरा समाज की आबादी लगभग 8 प्रतिशत है और एसटी दर्जा मिलने से समाज को शिक्षा, रोजगार और सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा।
बैठक में यह निर्णय लिया गया कि इस मांग को जन-जन तक पहुँचाने के लिए आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाएगी।
इस अवसर पर प्रधान महासचिव धीरेंद्र निषाद, प्रदेश महासचिव अखिलेश कुमार चौधरी, उपाध्यक्ष प्रियम्वदा निषाद, मीडिया प्रभारी मनोज कुमार चौधरी, सुनील कुमार चौधरी, शशि कुमार मंडल, पुरुषोत्तम प्रियदर्शी, सतीश कुमार एवं गौरव कुमार सहित अनेक पदाधिकारी उपस्थित रहे।


