लेखक: डॉ.अवनीश कुमार, इटावा
गाजियाबाद।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ को लेकर देशभर में सियासी और सामाजिक बहस तेज़ हो गई है। यह कानून जहां अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को जातिगत भेदभाव से सुरक्षा देने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है, वहीं कुछ अगड़ी जाति संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है।
यूजीसी का यह नया रेगुलेशन 15 जनवरी 2026 से देश के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में लागू हो चुका है। उत्तर प्रदेश के शिक्षण संस्थानों में भी इसके अनुपालन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। ऐसे में 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी अहम माना जा रहा है।
क्या है यूजीसी समानता नियम 2026?
यूजीसी द्वारा जारी नए नियमों के तहत अब
एससी-एसटी के साथ-साथ ओबीसी वर्ग को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है।
ओबीसी छात्र, शिक्षक और कर्मचारी अपने साथ होने वाले भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दर्ज करा सकेंगे।
प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान में समान अवसर प्रकोष्ठ का गठन अनिवार्य होगा।
विश्वविद्यालय स्तर पर एक समानता समिति बनाई जाएगी, जिसमें ओबीसी, एससी, एसटी, महिला और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
यह समिति हर छह महीने में अपनी रिपोर्ट यूजीसी को भेजेगी।
यूजीसी का कहना है कि यह कदम उच्च शिक्षा में समानता, गरिमा और समावेशन सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
विरोध की अगुवाई, अनशन की घोषणा
नए कानून के खिलाफ डासना पीठ के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरि ने खुलकर मोर्चा खोल दिया है। शुक्रवार को वे जंतर-मंतर पर अनशन करने के लिए दिल्ली जा रहे थे, लेकिन गाजियाबाद में ही पुलिस ने उन्हें रोककर नजरबंद कर दिया। इसके बाद उन्होंने योगी सरकार पर सवर्ण समाज की आवाज़ दबाने का आरोप लगाया।
यति नरसिंहानंद को रोके जाने के बाद यह मामला और गरमा गया है और सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों तक इस पर चर्चा तेज हो गई है।
अगड़ी जातियों का तर्क क्या है?
विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि इस कानून का दुरुपयोग हो सकता है और इसके जरिए अगड़ी जातियों के छात्रों व शिक्षकों को झूठे मामलों में फंसाया जा सकता है।
जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने मिलकर ‘सवर्ण समाज समन्वय समिति (S-4)’ का गठन किया है। उत्तर प्रदेश में भी कुछ सवर्ण संगठनों और सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स ने इसके खिलाफ अभियान शुरू कर दिया है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
यूजीसी द्वारा संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट में पेश किए गए आंकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में लगातार इजाफा हुआ है।
वर्ष 2019-20 में 173 शिकायतें दर्ज हुईं
वर्ष 2023-24 में यह संख्या बढ़कर 378 हो गई
पिछले पाँच वर्षों में शिकायतों में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई
इन वर्षों में 704 विश्वविद्यालयों और 1553 कॉलेजों से कुल 1160 शिकायतें यूजीसी को प्राप्त हुईं।
वर्चस्व बनाम समानता की बहस
सामाजिक न्याय के पक्षधर संगठनों का कहना है कि आज़ादी के दशकों बाद भी उच्च शिक्षण संस्थानों में वंचित वर्गों की भागीदारी 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकी है। ओबीसी को 1990 से नामांकन में और 2010 से फैकल्टी भर्ती में आरक्षण मिलने के बावजूद वास्तविक प्रतिनिधित्व बेहद कम है।
ऐसे में यूजीसी का यह कदम संरक्षण नहीं, बल्कि बराबरी की कोशिश है।
सवाल जो उठ रहे हैं
राजनीतिक और सामाजिक हलकों में यह सवाल भी उठ रहा है कि—
जब ईडब्ल्यूएस (सवर्ण आरक्षण) यानी सुदामा कोटा लागू हुआ, तब इतना विरोध क्यों नहीं हुआ?
जब सरकार पिछड़ों और दलितों के अधिकारों की बात करती है, तभी असंतोष क्यों बढ़ जाता है?
निष्कर्ष
यूजीसी समानता नियम 2026 को लेकर छिड़ी बहस ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि मुद्दा कानून का नहीं, बल्कि बराबरी और वर्चस्व का है। आने वाले दिनों में यह कानून न सिर्फ शिक्षा जगत, बल्कि राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है।


