

मैनपुरी। थाना कुर्रा क्षेत्र के सेहा खुर्द गांव में एक किसान की संदिग्ध परिस्थितियों में आग से मौत हो जाने से पूरे इलाके में तनाव फैल गया। परिजनों ने मुआवजा और कृषि भूमि का पट्टा दिए जाने की मांग को लेकर शव का अंतिम संस्कार करने से इनकार कर दिया और गांव में धरना शुरू कर दिया।
गांव निवासी करीब 50 वर्षीय किसान बेचालाल रोज की तरह रात में भोजन के बाद खेत में फसल की सिंचाई करने गए थे। वह शिलेन्द्र यादव के खेत में पानी लगाने पहुंचे थे। अगली सुबह उनका शव खेत की मेड़ पर अलाव के पास अधजली अवस्था में मिला। इस घटना से पूरे गांव में सनसनी फैल गई।
मृतक के पुत्र राघवेंद्र ने इसे हादसा मानने से इनकार करते हुए हत्या की आशंका जताई। उनका कहना है कि साक्ष्य मिटाने के लिए शव को जलाया गया है। पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम कराकर परिजनों को सौंप दिया, लेकिन इसके बाद आक्रोश और बढ़ गया।
हंगामे की सूचना पर एएसपी ग्रामीण राहुल मिठास, तहसीलदार किशनी घासीराम, सीओ करहल अजय सिंह चौहान और कुर्रा इंस्पेक्टर विक्रांत गुर्जर पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। करीब दो घंटे तक चली बातचीत के बाद प्रशासन ने दैवीय आपदा मद से चार लाख रुपये मुआवजा और पांच बीघा कृषि भूमि का पट्टा देने का लिखित आश्वासन दिया। इसके बाद परिजन अंतिम संस्कार के लिए राजी हुए।
अगले दिन भारतीय कश्यप सेना संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रताप सिंह खालसा गांव पहुंचे और परिजनों के साथ प्रशासन से मुआवजा व भूमि पट्टा शीघ्र उपलब्ध कराने की मांग दोहराई। मांगें पूरी न होने तक धरना जारी रखने की घोषणा की गई, जिससे प्रशासन पर दबाव बढ़ गया।
फिलहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है। परिजन हत्या की आशंका पर अड़े हैं, जबकि प्रशासन ने आश्वासन देकर स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया है।
मैनपुरी के सेहा खुर्द गांव में किसान बेचालाल की संदिग्ध मौत ने कानून-व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खेत की मेड़ पर अधजला शव मिलना महज हादसा है या सुनियोजित अपराध—यह स्पष्ट न होना, जांच की दिशा पर संदेह पैदा करता है। परिजनों का हत्या का आरोप और साक्ष्य मिटाने की आशंका प्रशासन के लिए चुनौती बन गई है।
घटना के बाद परिजनों का अंतिम संस्कार से इनकार और धरना, ग्रामीण आक्रोश की गहराई को दर्शाता है। प्रशासन द्वारा दैवीय आपदा मद से मुआवजा और भूमि पट्टे का आश्वासन स्थिति संभालने का प्रयास है, पर यह अस्थायी समाधान प्रतीत होता है। भारतीय कश्यप सेना का हस्तक्षेप मामले को सामाजिक आंदोलन का रूप दे सकता है।
जरूरी है कि पुलिस निष्पक्ष, तेज और पारदर्शी जांच करे, ताकि सच सामने आए। केवल मुआवजा नहीं, न्याय की गारंटी ही भरोसा बहाल कर सकती है।


